भुजरिया से जुड़ी परंपरा… क्यों मनाया जाता है ये पर्व?

भुजरिया मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड, चंबल, महाकौशल और कुछ मालवा अंचलों में मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण लोकपर्व है। इसे भुजलिया, भुंजरिया या कजलिया पर्व भी कहा जाता है। सामान्यतः यह रक्षाबंधन के अगले दिन यानी भाद्रपद कृष्ण/शुक्ल परंपरा के अनुसार स्थानीय तिथि पर मनाया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी तिथि और रीति में थोड़ा अंतर मिलता है। भुजरिया मूल रूप से गेहूं या जौ के अंकुरित पौधों को कहा जाता है। सावन के दिनों में गेहूं अथवा जौ के दाने छोटी टोकरियों, मिट्टी के पात्रों या मिट्टी की परत में बोए जाते हैं। उन्हें नियमित रूप से पानी दिया जाता है। कुछ दिनों में जब हरे-हरे अंकुर निकल आते हैं तो इन्हें भुजरिया कहा जाता है। इन हरी भुजरियों को प्रकृति, हरियाली और अन्न-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

भुजरिया मनाने की परंपरा –
इस पर्व के पीछे कई लोक मान्यताएं हैं, लेकिन इसका सबसे प्रमुख भाव अच्छी वर्षा, अच्छी फसल और परिवार एवं समाज की खुशहाली की कामना है।
बरसात के मौसम में जब खेतों में हरियाली छाने लगती है, तब अंकुरित अनाज के रूप में भुजरिया प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम बनती है। ग्रामीण समाज में अन्न और वर्षा जीवन का आधार रहे हैं, इसलिए भुजरिया का संबंध सीधे कृषि और प्रकृति से जुड़ गया। मध्य प्रदेश के कई क्षेत्रों में भी भुजरिया- कजलियां को लोक-संस्कार, पारंपरिक आस्था और सामाजिक उत्साह का प्रतीक माना जाता है।

आल्हा-ऊदल से जुड़ी लोकगाथा –
भुजरिया पर्व की एक प्रसिद्ध लोकमान्यता बुंदेलखंड के वीर योद्धाओं आल्हा और ऊदल से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि भुजरिया की परंपरा का संबंध महोबा के आल्हा-ऊदल और उनकी वीरगाथाओं से रहा है। मध्य प्रदेश के भिंड जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट भी भुजरिया मेले को आल्हा और ऊदल के नाम से संबद्ध बताती है। लोककथाओं में यह भी कहा जाता है कि आल्हा की बहन चंदा के स्वागत से भुजलिया देने की परंपरा जुड़ी थी। हालांकि यह बात लोकमान्यता है, इसे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि लोक परंपरा के रूप में देखना उचित है। इसी कारण कई स्थानों पर भुजरिया पर्व के साथ आल्हा गायन, दंगल और पारंपरिक खेलों की परंपरा भी देखने को मिलती है।

भुजरिया बांटने की परंपरा का महत्व –
इस पर्व की सबसे सुंदर परंपराओं में से एक है एक-दूसरे को भुजरिया देना। लोग अपने रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों को भुजरिया देकर शुभकामनाएं देते हैं। कई स्थानों पर लोग एक-दूसरे से गले मिलकर पुराने मतभेद समाप्त करने का संदेश भी देते हैं, इसलिए भुजरिया केवल खेती और हरियाली का पर्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता और भाईचारे का पर्व भी है। भिंड के सरकारी विवरण में भी भुजरिया के अवसर पर एक-दूसरे को गेहूं की नई कोंपलें देकर सम्मान और शुभकामनाओं के आदान-प्रदान का उल्लेख है।

भुजरिया पर्व कैसे मनाया जाता है –
क्षेत्र के अनुसार परंपराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन सामान्य रूप से सावन में गेहूं या जौ के दाने बोए जाते हैं। उन्हें प्रतिदिन पानी देकर अंकुरित किया जाता है। अंकुरित पौधों की श्रद्धा से देखभाल की जाती है।
पर्व के दिन इन्हें घर से निकालकर सामूहिक रूप से ले जाया जाता है। लोग भुजरिया एक-दूसरे को भेंट करते हैं। बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया जाता है। कई स्थानों पर भुजरिया का तालाब, नदी या अन्य जलस्रोत में विसर्जन किया जाता है।

प्रकृति से जुड़ा संदेश –
भुजरिया पर्व का सबसे महत्वपूर्ण संदेश आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है। एक छोटे से गेहूं के अंकुर के माध्यम से यह पर्व मनुष्य को याद दिलाता है कि हमारा जीवन मिट्टी, पानी, बीज, वर्षा और प्रकृति पर निर्भर है। इस दृष्टि से भुजरिया को जल संरक्षण, हरियाली, कृषि और पर्यावरण के प्रति सम्मान से जोड़कर भी देखा जा सकता है। भुजरिया की एक खास विशेषता यह है कि इसमें केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि लोगों का आपस में मिलना-जुलना भी महत्वपूर्ण है। कई क्षेत्रों में भुजरिया देकर लोग यह संदेश देते हैं कि पुरानी नाराजगी भूलें, रिश्तों को मजबूत करें और समाज में प्रेम व भाईचारा बढ़ाएं। इसीलिए भुजरिया को प्रकृति, कृषि, शौर्य, प्रेम और सामाजिक समरसता का संगम कहा जा सकता है।

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