रक्षाबंधन पर्व मनाने की ये है परंपरा, जानिए क्या?

रक्षाबंधन पर्व भाई-बहन के रिश्तों का सबसे पवित्र त्यौहार है। ये सिर्फ भाई की कलाई पर राखी बांधने का ही नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, स्नेह, जिम्मेदारी और एक-दूसरे की रक्षा के संकल्प का त्यौहार है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रक्षाबंधन को लेकर कई मान्यताएं भी हैं। इसको लेकर विभिन्न कथाएं भी हैं।

भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कथा –
रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे लोकप्रिय पौराणिक कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कथा प्रमुख है। मान्यता है कि चीर हरण के दौरान भगवान श्रीकृष्ण की उंगली में चोट लगने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का कपड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था। द्रौपदी के इस स्नेह से प्रभावित होकर श्रीकृष्ण ने उनकी रक्षा का संकल्प लिया। महाभारत की कथा में बाद में श्रीकृष्ण द्वारा द्रौपदी की लाज बचाने को इसी भाव से जोड़ा जाता है। यह कथा बताती है कि रक्षा का रिश्ता केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं होता, बल्कि सच्चे प्रेम, विश्वास और समर्पण से भी बनता है।

मां लक्ष्मी और राजा बलि की कथा –
एक अन्य प्रसिद्ध मान्यता भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राजा बलि से जुड़ी है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर पाताल लोक में रहने लगे। भगवान विष्णु के दूर रहने से माता लक्ष्मी चिंतित हुईं। उन्होंने राजा बलि को राखी बांधी और उन्हें अपना भाई माना। जब राजा बलि ने उपहार मांगने को कहा तो माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को वैकुंठ लौटने देने का आग्रह किया। राजा बलि ने राखी के रिश्ते का सम्मान करते हुए उनकी इच्छा स्वीकार कर ली। इस कथा में राखी को विश्वास, वचन और रिश्ते की मर्यादा का प्रतीक माना गया है।

इंद्राणी और इंद्र की कथा भी महत्वपूर्ण –
रक्षाबंधन की एक प्राचीन कथा देवताओं और असुरों के युद्ध से संबंधित है। भविष्य पुराण से जुड़ी मान्यता के अनुसार देवताओं के संकट में पड़ने पर इंद्र की पत्नी शची (इंद्राणी) ने इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था। इसके बाद इंद्र ने युद्ध में विजय प्राप्त की। इस कथा के कारण भी श्रावण पूर्णिमा पर रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा को धार्मिक आधार मिलता है।

रक्षाबंधन का सामाजिक संदेश –
समय के साथ रक्षाबंधन का स्वरूप व्यापक हुआ है। आज यह पर्व केवल सगे भाई-बहन तक सीमित नहीं है। चचेरे-ममेरे भाई-बहन, रिश्तेदार और कई स्थानों पर मित्र भी एक-दूसरे को राखी बांधकर स्नेह और विश्वास का रिश्ता मजबूत करते हैं। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार भी रक्षाबंधन की भावना जाति और समुदाय की सीमाओं से आगे जाकर रिश्तों और सद्भाव को जोड़ने वाली है। आज जब परिवारों में दूरी बढ़ रही है और व्यस्त जीवनशैली के कारण लोग एक-दूसरे के लिए समय कम निकाल पा रहे हैं, रक्षाबंधन रिश्तों को फिर से मजबूत करने का अवसर देता है। राखी का धागा हमें याद दिलाता है कि रिश्ते केवल अधिकार से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, सम्मान और विश्वास से मजबूत होते हैं। इस पर्व का संदेश यह भी है कि भाई की जिम्मेदारी केवल बहन की रक्षा करना नहीं, बल्कि उसके सम्मान, स्वतंत्रता, अधिकार और आत्मनिर्भरता का सम्मान करना भी है। वहीं बहन भी भाई के सुख-दुख में उसके साथ खड़ी रहने का भाव रखती है।

रक्षाबंधन की पूजा-विधि –
परंपरागत रूप से राखी की थाली में रोली या कुमकुम, अक्षत, दीपक, मिठाई और राखी रखी जाती है। बहन भाई को तिलक लगाकर आरती करती है और उसकी कलाई पर राखी बांधती है। इसके बाद मिठाई खिलाई जाती है। भाई बहन को उपहार देकर उसके सुख और सुरक्षा की कामना करता है।

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