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ब्लैकलिस्टेड वेयरहाउसों पर मेहरबान प्रशासन, नियम ताक पर रख फिर शुरू हुई अनाज खरीदी

सीहोर। जिले में वेयरहाउसिंग कॉर्पोरेशन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के चलते जिन वेयरहाउसों को स्वयं कलेक्टर ने ब्लैकलिस्ट किया था, उनमें न केवल सरकारी खजाना लुटाया जा रहा है, बल्कि उन्हीं परिसरों में नए नाम से दोबारा खरीदी का खेल शुरू हो गया है। प्रशासन की इस ‘उदारता’ ने सरकारी नियमों और जांच रिपोर्टों को मजाक बना दिया है।
बता दें कि पिछले वर्ष गेहूं उपार्जन के दौरान जिले के चार प्रमुख वेयरहाउसों में बड़ी गड़बडिय़ां उजागर हुई थीं। जांच समिति की रिपोर्ट में दोष सिद्ध होने के बाद कलेक्टर ने सख्त रुख अपनाते हुए इन वेयरहाउसों को वर्ष 2026-27 तक के लिए ब्लैकलिस्ट और निलंबित कर दिया था। नियम यह कहता है कि ब्लैकलिस्ट होते ही संबंधित वेयरहाउस से सरकारी स्टॉक तुरंत खाली कराया जाना चाहिए, लेकिन हकीकत इसके उलट है।
सरकारी खजाने से जा रहा किराया
आश्चर्य की बात यह है कि निलंबन के महीनों बाद भी इन ब्लैकलिस्टेड वेयरहाउसों में गेहूं का सरकारी स्टॉक जमा है। इससे भी बड़ी अनियमितता यह है कि सरकार इन अपात्र केंद्रों को प्रतिमाह किराया भी दे रही है। सवाल यह उठता है कि जब इन केंद्रों को दागी मानकर प्रतिबंधित कर दिया गया है तो इन्हें सरकारी भुगतान क्यों किया जा रहा है।
वही परिसर, नया नाम, खेल निराला
मामले में सबसे सनसनीखेज खुलासा चरनाल क्षेत्र से हुआ है। यहां जिस वेयरहाउस को ब्लैकलिस्ट किया गया थाए उसी परिसर में रातों-रात एक नया केंद्र खोल लिया गया। कागजों पर नाम बदलकर इस नए वेयरहाउस को वर्तमान खरीदी सत्र के लिए चयनित भी कर लिया गया और वहां अनाज की आवक भी शुरू हो चुकी है। यह सीधा-सीधा नियमों को दरकिनार कर दागी संचालकों को लाभ पहुंचाने का मामला नजर आ रहा है।
अधिकारियों के गोलमोल जवाब
इमरतलाल सूर्यवंशी नोडल अधिकारी का कहना है कि कोई भी व्यक्ति अलग नाम से वेयरहाउस ले सकता है। इसकी जांच करना समितियों और आपूर्ति विभाग का काम है। उन्होंने यह भी स्वीकारा कि 2025 का माल कब उठेगा, यह अभी तय नहीं है।
दीप्ति सिंह शाखा प्रबंधक का तर्क दिया कि प्रोपराइटर बदलकर आवेदन किया जा सकता है। हालांकि उन्होंने गड़बड़ी पाए जाने पर जांच का आश्वासन जरूर दिया है।

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