
सीहोर। आस्था और शक्ति की उपासना का महापर्व चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से प्रारंभ हो रहा है। इस वर्ष नवरात्रि पूरे 9 दिनों की होगी, जिसके चलते राम नवमी 27 मार्च को मनाई जाएगी। ज्योतिषाचार्य आचार्य अभय बसंत शुक्ला के अनुसार प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 19 मार्च को सुबह 06.52 बजे से होगी, जो अगले दिन 20 मार्च को सुबह 04.52 बजे तक रहेगी।
नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना का विशेष महत्व होता है। आचार्य श्री ने इसके लिए दो श्रेष्ठ मुहूर्त बताए हैं, जिसमें प्रात: काल मुहूर्त सुबह 06.52 से 08.06 तक। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12.22 से 01.11 तक।
प्रथम दिन मां शैलपुत्री की आराधना
नवरात्रि के पहले दिन नवदुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। माता के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। मान्यता है कि इनकी आराधना से स्त्रियों को अखंड सौभाग्य और कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है। पहले दिन भक्तों को नारंगी, लाल या पीले रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ माना गया है।
ऐसे करें घट कलश स्थापना
स्थान का चयन: घर के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) को साफ कर वहां लकड़ी का पाटा रखें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएं।
जौ बोना: एक मिट्टी के पात्र में मिट्टी और गोबर के कंडे की खाद डालें। इसमें जौ के दाने समान रूप से छिडक़ें और ऊपर से हल्की मिट्टी डालकर गंगाजल छिडक़ें।
कलश तैयार करना: तांबे या मिट्टी के कलश पर रोली से स्वास्तिक बनाएं और गले में कलावा बांधें। कलश में जल भरकर उसके मुख पर आम के पत्ते रखें।
नारियल स्थापना: कलश के ऊपर लाल कपड़े में लिपटा हुआ और कलावा बंधा हुआ नारियल स्थापित करें।
आह्वान: सभी देवी-देवताओं का आह्वान करें कि वे 9 दिनों तक कलश में विराजमान हों। इसके बाद फल, मिठाई, इत्र और पुष्प अर्पित कर आरती करें।
नियम, क्या खाएं और किनसे बचें
आचार्य शुक्ला ने बताया कि व्रत में सात्विकता का पालन अनिवार्य है कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, समा के चावल, फल, मेवे, दूध, पनीर और सेंधा नमक का ही सेवन करें। गेहूं, चावल, दाल, प्याज, लहसुन, साधारण नमक और मांसाहार पूरी तरह वर्जित है। व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करें। क्रोध और झूठ से बचें। दिन में सोने, बाल कटवाने, दाढ़ी बनाने और नाखून काटने से परहेज करना चाहिए।
पौराणिक कथा: सती से शैलपुत्री बनने का सफर
माता शैलपुत्री पूर्वजन्म में दक्ष प्रजापति की पुत्री सती थीं। भगवान शंकर के अपमान और पिता द्वारा आयोजित यज्ञ में बिना बुलाए जाने के कारण हुए तिरस्कार से क्षुब्ध होकर सती ने योगाग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया था। यही सती अगले जन्म में हिमालय की पुत्री शैलपुत्री के रूप में अवतरित हुईं।
पूजन सामग्री की सूची
लाल चुनरी, आम के पत्ते, दुर्गा सप्तशती पुस्तक, लाल कलावा, गंगाजल, चंदन, नारियल, कपूर, जौ के बीज, मिट्टी का पात्र, सुपारी, पान के पत्ते, लौंग और इलायची। प्रतिदिन सुबह-शाम दुर्गा सप्तशती का पाठ और आरती करना शुभ फलदायी होता है।