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दहेज प्रताडऩा के मामले में पति और ससुराल पक्ष बरी, कोर्ट ने कहा- साक्ष्य के अभाव में आरोप सिद्ध नहीं

सीहोर। स्थानीय अदालत ने दहेज उत्पीडऩ से जुड़े एक चर्चित मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पति और उसके परिजनों को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया है। यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 498.ए और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 व 4 के तहत दर्ज किया गया था, जिसमें क्रूरता और दहेज की मांग के आरोप लगाए गए थे।
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का सूक्ष्मता से विश्लेषण किया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह असफल रहा। तथ्यों की कमी और पुख्ता सबूत न होने के कारण न्यायालय ने परिवार को राहत देते हुए उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया।
कानून का दुरुपयोग न हो: अधिवक्ता अर्शुमा सुहेल सैयद
बचाव पक्ष की ओर से प्रभावी पैरवी करने वाली अधिवक्ता अर्शुमा सुहेल सैयद ने अदालत में तर्क रखा कि समाज में अक्सर आरोप लगते ही व्यक्ति को दोषी मान लिया जाता है, जबकि न्याय का आधार केवल तथ्य होते हैं। फैसले के बाद उन्होंने कहा धारा 498.ए और दहेज निषेध अधिनियम का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षा देना है, न कि इसका दुरुपयोग कर निर्दोष परिवारों को प्रताडि़त करना। एक अधिवक्ता का कर्तव्य है कि वह पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ सत्य को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करे।

निर्णय के मायने
कानूनी जानकारों के अनुसार, यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि अदालतें साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय देती हैं और केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यह निर्णय न केवल संबंधित परिवार के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्यायालय में तथ्य और प्रमाण ही अंतिम रूप से निर्णायक होते हैं।का उद्देश्य महिलाओं को क्रूरता और उत्पीड़न से संरक्षण देना है, न कि इसका दुरुपयोग कर किसी निर्दोष व्यक्ति या उसके परिवार को प्रताड़ित करना। उन्होंने जोर दिया कि जब लोग मौन रहकर भी न्यायिक व्यवस्था पर विश्वास जताते हैं, तब न्याय व्यवस्था से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

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