नर्मदा जयंती विशेष: सीहोर की जीवनरेखा है ‘रेवा’, यहां मिले थे दुनिया के सबसे पुराने मानव अवशेष, 52 गांवों को मिलता है ‘मां’ का आशीष

सीहोर। आज पूरा देश नर्मदा जयंती का पर्व उल्लास के साथ मना रहा है। जब हम मां नर्मदा की महिमा का बखान करते हैं तो सीहोर जिले का नाम स्वर्ण अक्षरों में उभर कर आता है। सीहोर सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि नर्मदा सभ्यता का वह गवाह है जहां लाखों साल पहले मानव सभ्यता ने आकार लिया था। जिले की दक्षिणी सीमा पर करीब 50 किलोमीटर तक बहने वाली मां नर्मदा यहां के 52 गांवों की प्यास बुझाने के साथ-साथ हजारों परिक्रमावासियों का मार्ग भी प्रशस्त करती है।
सीहोर जिले का हथनोरा गांव पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के लिए तीर्थ के समान है। यहां नर्मदा के तट पर पुरातत्वविदों को भारत के सबसे पुराने मानव अवशेष मिले थे, जिन्हें नर्मदा मानव नाम दिया गया। यह इस बात का प्रमाण है कि जब दुनिया के अन्य हिस्सों में सभ्यता का विकास भी नहीं हुआ था, तब सीहोर के इन तटों पर मानव जीवन फल फूल रहा था।
50 किमी का सफर और 52 गांवों की खुशहाली
नर्मदा नदी सीहोर जिले की दक्षिणी सीमा का निर्धारण करती है। मुख्य रूप से बुधनी विधानसभा के करीब 40 से 52 गांव सीधे तौर पर नर्मदा के जल पर निर्भर हैं। इनमें बुधनी, शाहगंज, जैत, बोरना, पिलानी, हथनोरा और सरदारनगर जैसे प्रमुख तटवर्ती क्षेत्र शामिल हैं। इन गांवों की खेती और अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार मां नर्मदा का आशीष ही है।
परिक्रमावासियों के लिए आस्था का गलियारा
नर्मदा परिक्रमा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए सीहोर का मार्ग अत्यंत सुगम और महत्वपूर्ण है। श्रद्धालु रायसेन जिले की सीमा पार कर शाहगंज के रास्ते सीहोर जिले में प्रवेश करते हैं। यहां से जैत, बोरना होते हुए वे बुधनी पहुंचते हैं। सीहोर के इन गांवों में परिक्रमावासियों के लिए सेवा और भोजन की अटूट परंपरा है। यहां विश्राम करने के बाद श्रद्धालु देवास जिले के नेमावर की ओर प्रस्थान करते हैं।
आज बुधनी और शाहगंज में दीपदान की धूम
आज 25 जनवरी को नर्मदा जयंती के अवसर पर सीहोर जिले के प्रमुख घाटों पर दीपावली जैसा माहौल है।
बुधनी घाट: यहां होने वाली नर्मदा आरती और महा प्रसादी में हजारों श्रद्धालु शामिल हो रहे हैं।
शाहगंज घाट: यहां मां नर्मदा का शांत और विशाल स्वरूप देखते ही बनता है, जहां आज विशेष पूजन अर्चन किया जा रहा है।

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