
सुमित शर्मा
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यूं तो आज के इस ’कलयुग’ में हर क्षेत्र में गिरावट आई है। चाहे अध्यात्मक हो, राजनीति हो, पत्रकारिता हो या अन्य कोई क्षेत्र हो, लेकिन हमारी सनातन संस्कृति में साधु-संत, ब्राह्म्णों को सर्वोपरि माना जाता है, उन्हें सबसे उच्च कोटि का दर्जा दिया जाता है। नेता और अफसर भी समाज, जनता के सेवक होते हैं। वे समाज एवं जनता के लिए कार्य करते हैं, लेकिन इस समय संत, नेता और अफसरों के गिरते चरित्र बेहद चिंता का विषय है तो वहीं यह बेहद निंदनीय भी है। दरअसल संत, नेता और अफसर… इन तीनों के ’गिरते चरित्र’ सीहोर जिले में देखने को मिले। अगर समाज के ये तीन मुख्य ’चरित्रवान’ ही ’चरित्रहीन’ होने लगे तो फिर समाज किस दिशा में जा रहा है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। दरअसल पिछले कुछ दिनों में सीहोर में ऐसे घटनाक्रम सामने आए, जिनमें संत मंच से खुली गाली बकते सुने गए, तो वहीं राजनीति में भी बेहद शर्मसार करने वाली घटना घटित हुई। प्रशासन में तो हर दिन अलग-अलग चरित्र सामने आते हैं।
सीहोर जिले की भैरूंदा तहसील के नर्मदा तट सातदेव स्थित मंदिर में 21 दिनों तक महायज्ञ का आयोजन चला। इस महायज्ञ का समापन भी पिछले दिनों हो गया। महायज्ञ बाबा शिवानंद के नेतृत्व में हुआ। इस दौरान बाबा शिवानंद के दो वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुए, जिसमें वे मंच से ही खुली गालियां देते सुने गए। एक वीडियो में तो उन्होंने भाजपा और कांग्रेस के नेताओं को ही खुली चुनौती दे डाली। बाबा शिवानंद बोले कि यहां से भाजपा और कांग्रेस का कोई नेता अब नहीं जीत पाएगा। इस दौरान वे मां-बहन की सीधी-सीधी गालियां देते भी सुने गए। यदि साधु-संत ही जब इस तरह के किरदार में हो तो फिर समाज को सुरक्षित संरक्षित और सुदृढ़ कैसे बनाया जा सकता है। सैकड़ों भक्तों, महिलाओं की उपस्थिति में यह सब घटित हुआ, लेकिन इस पर अब तक किसी भी साधु-संत की टिप्पणी नहीं आना भी बेहद निंदनीय है। सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी इस मामले को उठाना चाहिए।
इसी तरह पिछले दिनों किसानों की गेहूं खरीदी सहित अन्य मांगों को लेकर कांग्रेस ने प्रदेशभर में आंदोलन की रणनीति बनाई। आंदोलन में शामिल होने के लिए वरिष्ठ नेताओं को भी जिलों की कमान सौंपी गई। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को सीहोर जिले की कमान मिली। वे आंदोलन में शामिल होने के लिए सीहोर पहुंचे तो जिलेभर से नेता, कार्यकर्ता भी सीहोर में जमा हुए। भाषणबाजी हुई, रैली लेकर, नारेबाजी करते हुए सीहोर कलेक्टर कार्यालय में पहुंचे। नेता प्रतिपक्ष ने कलेक्टर को ज्ञापन देने के लिए बुलावा भेजा, लेकिन कलेक्टर बालागुरू के. नहीं पहुंचे। बताया जा रहा है कि कलेक्टर बालागुरू के. उस वक्त अपने कार्यालय में उपस्थित भी नहीं थे, इसके लिए एडीएम वृंदावन सिंह ज्ञापन लेने पहुंचे, लेकिन नेता प्रतिपक्ष एवं कांग्रेसी कलेक्टर को ही ज्ञापन देना चाहते थे। इस दौरान उमंग सिंघार गुस्से में भी नजर आए। इस घटना के बाद जो सामने आया वह नेताओं, अफसरों के चरित्र के विपरीत दिखा। दरअसल उमंग सिंघार ने ज्ञापन की कॉपी एक कुत्ते के गले में डाली और उसे कलेक्टर बताते हुए कहा कि ये सीहोर के नए कलेक्टर हैं। राजनीति में यूं तो मंच से नेता एक-दूसरे को हमेशा से ही कौसते हुए दिखाई एवं सुनाई देते हैं, लेकिन यह सिर्फ मंच तक ही सीमित रहता है। इसके बाद ही स्थिति दूसरी होती है। हालांकि कलेक्टर को कुत्ता बताने के बाद नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल भी हुए एवं उनकी जमकर आलोचना भी हुई, लेकिन इस घटनाक्रम में अधिकारियों का भी एक चरित्र सामने आया। यूं तो अधिकारी और नेताओं की मिलीभगत किसी से छिपी नहीं है। पर्दे के पीछे दोनों की सांठ-गांठ बेहद मजबूत रहती है। अधिकारी खुद को जनता का सेवक बताते हैं, उनके लिए जनता सर्वोपरि होती है। सीहोर में कार्यभार संभालते वक्त कलेक्टर बालागुरू के. ने खुद को जनता का सेवक बताते हुए जनसुनवाई में बैठकर उनकी समस्याओं को सुना, निराकरण के निर्देश भी दिए। हालांकि यह निर्देश पूरी तरह हवाहवाई ही साबित हुए। ज्यादातर मामलों में लोगों को न्याय नहीं मिला। साहब नेताओं, पत्रकारों से मिलने में भी गुरेज करते हैं, लेकिन उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि नेता, पत्रकार भी जनता के ही प्रतिनिधि के तौर पर उनसे मिलने के लिए पहुंचते हैं। खैर… कांग्रेस ने भी आंदोलन किसानों के हितों को लेकर किया। यदि कलेक्टर नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार से मिलने पहुंचते तो शायद इसमें कोई बुराई नहीं थी, लेकिन कलेक्टर बालागुरू के. की भी कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, जिन्होंने उन्हें उनसे मिलने नहीं दिया। यहां हम बात ’चरित्र’ की कर रहे हैं, तो इसमें एक बात साफ होनी चाहिए कि ’चरित्र’ तो एक ही होना चाहिए। यदि संत, नेता, अधिकारी समय के अनुसार अपने चरित्र बदलते हैं तो उन्हें ’चरित्रहीन’ ही कहा जाना चाहिए।