विजयासन हॉस्पिटल मामला, सात दिन बीते, पर जांच की सुई वहीं अटकी, आखिर मौन क्यों है स्वास्थ्य विभाग

सीहोर। रेहटी के विजयासन हॉस्पिटल में उपचार के दौरान ग्राम बोरघाटी निवासी मनीराम की मृत्यु को एक सप्ताह बीत चुका है, लेकिन प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कछुआ चाल ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिजनों द्वारा इलाज में बरती गई लापरवाही और गलत जानकारी देने के सीधे आरोपों के बावजूद अब तक किसी ठोस कार्रवाई का सामने न आना क्षेत्र में चर्चा और आक्रोश का विषय बना हुआ है।
घटना के बाद अस्पताल परिसर में हुए भारी हंगामे और पुलिस द्वारा किए गए पंचनामे के बाद उम्मीद थी कि विभाग त्वरित कार्रवाई करेगा। लेकिन हफ्ता भर बीतने को है और जिम्मेदार अधिकारी अब भी पोस्टमार्टम रिपोर्ट का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या केवल पीएम रिपोर्ट ही जांच का आधार है? अस्पताल में उस वक्त संबंधित विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद थे या नहीं, क्या अस्पताल के पास गंभीर मरीजों को भर्ती करने का वैध पंजीकरण और संसाधन हैं, इन तकनीकी पहलुओं पर स्वास्थ्य विभाग ने अब तक चुप्पी क्यों साध रखी है।
विशेषज्ञों की कमी और रेफर का खेल
स्थानीय स्तर पर यह आरोप आम हैं कि रेहटी और बुधनी क्षेत्र के कई निजी अस्पतालों में विशेषज्ञों की उपलब्धता केवल कागजों तक सीमित है। गंभीर स्थिति में मरीजों को भर्ती तो कर लिया जाता है, लेकिन जब स्थिति बिगड़ती है तो उन्हें आनन फानन में अन्यत्र रेफर कर दिया जाता है। मनीराम के मामले में भी परिजनों का यही दर्द है कि उन्हें सही स्थिति नहीं बताई गई।
बीएमओ और सीएमओ के जवाब का इंतजार
हैरानी की बात यह है कि इस संवेदनशील मामले पर न तो बुधनी बीएमओ और न ही मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी किया गया है। मीडिया द्वारा पूछे जाने पर भी जांच जारी होने का रटा रटाया जवाब मिल रहा है।
जनता की मांग, सार्वजनिक हो जांच रिपोर्ट
क्षेत्रवासियों का कहना है कि हर हादसे के बाद आश्वासन की घुट्टी पिला दी जाती है, लेकिन हकीकत में निजी अस्पतालों की मनमानी पर लगाम नहीं कसी जाती। लोगों ने मांग की है कि अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज और ड्यूटी चार्ट को सार्वजनिक किया जाए। जांच की प्रगति की रिपोर्ट समय-समय पर साझा की जाए। यदि अस्पताल दोषी है तो उसका लाइसेंस तुरंत निरस्त कर जिम्मेदारी तय की जाए।

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