धर्म

पाप कर्म का फल हानिकारक है 

कहहिं कबीर यह कलि है खोटी। जो रहे करवा सो निकरै टोटी।। एक छोटा सा पहाड़ी गांव था। ग्राम के सभी लोग शराब व मांस का सेवन करते थे। जो शराब नहीं पीता था, जो मांस नहीं खाता था उसे ग्राम सजा के रूप में ग्राम बाहर कर देते थे। उसी ग्राम का एक आदमी अपने संबंधी के गांव गया। ग्राम में संतजन आए हुए थे। अतऱ अपने समधी के साथ सत्संग में चला गया। उपदेश का जादू ऐसा कर गया कि वह तत्काल प्रभाव से शराब व मांस सेवन छोड़ दिया। गांव वापस आने पर पूरा परिवार इस र्दुव्यसन को छोड़ दिए। यह तथ्य ग्राम में फैल गई। बैठक हुई और उसे गांव बहिरा की सजा दे दी गई गांव वाले उस परिवार से कटने लगे। नाई, धोबी, नौकर आदि सब ने उसके यहां काम करना बंद कर दिया। कुछ दिन उसे जीवनयापन में अड़चन हुई परंतु धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया। गांव के और लोग उनसे प्रभावित होकर शराब मांस छोड़ दिए। साहेब कहते हैं कि, हे अभागा मनुष्य! तुम्हें बुरे कार्य करने के लिए किसने सम्मानित किया है जो रात दिन चोरी, झूठ, नशापान, मांस खाने में आनंद मानते हो और विषयों में सुख का भ्रम पाल रहे हो आज कल में तेरा अंत हो जाएगा। जीवन भर अशुभ कार्य करते हुए इस उत्तम मानव शरीर का दुरुपयोग ही किए हो अतऱ मृत्यु पश्चात तुम्हारा कहां निवास होगा इसका तुम्हें होश नहीं है। राम न रमसि कौन डंड लागा। राम भजन है शुभ कार्य। शुभ कार्य छोड़कर अशुभ काम में लिप्त रहने तुम्हें किसने दंडित या गांव बहिरा किया है? साहेब कहते हैं, पाप कर्म बहुत बुरी बात है। पाप कर्म का फल हानिकारक है, पाप कर्म काटने के लिए तीर्थ जाते हो। पूजा पाठ करते हो। 
केश-मुंडन कराते हो। तंत्र-मंत्र तथा पाखंड युक्त कर्म करके मुक्त होना चाहते हो। ये सब तुम्हारा भ्रम है अपने अंदर की पशुत्व को मिटाना छोड़ पशुबलि पर मुक्ति पाने का भ्रम पालते हो। साहेब कहते हैं, जीवन में जिसकी कमाई होगी उसी का फल मिलेगा। मनुष्य जो कुछ जीवन भर करता है उन्हीं सबका संस्कार मन में इकट्ठे होकर भीतर जमा होते हैं। और उन्हीं का फल आज तथा आगे मिलते हैं यदि तुमने जीवन में अच्छे संस्कार की कमाई की है तो तुम्हारे जीवन में शांति बनी रहेगी। ड्रम को मांज धोकर स्वच्छ जल भरोगे तो ड्रम के नल से स्वच्छ जल ही निकलेगा। गंदा पानी भरने से गंदा पानी निकलेगा। तेल भरने से तेल व जहर भरने से जहर ही निकलेगा। हे अभागे मनुष्य तू अपना माना हुआ सब कुछ छोड़कर एक दिन यहां से चला जाएगा। धन-जन साथी सब छूटेंगे। परंतु राम नहीं छूटेगा और राम है तेरी चेतना तेरा अभिन्न स्वरूप अतऱ सारी वासनाएं छोड़कर राम में लीन हो जा। वे कहते हैं। 
राम न रमसि कौन डंड लागा। 
मरि जबै का करिये अभागा।।  
 

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