‘मलमास’ एवं होलाष्टक से शुभ कार्यों पर लगेगी रोक, नहीं करें ये कार्य

हिन्दू परंपरा में मुहूर्त का विशेष महत्व होता है। हमारे सनातन धर्म में प्रत्येक कार्य के लिए एक अभीष्ट मुहूर्त निर्धारित है। वहीं कुछ अवधि ऐसी भी होती है, जब शुभ कार्य के मुहूर्त का निषेध होता है। इस अवधि में सभी शुभ कार्य वर्जित होते हैं। ऐसी ही एक अवधि है ‘मलमास’ जिसे ‘खरमास’ भी कहा जाता है। बालाजी ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र सीहोर के ज्योतिषाचार्य पंडित सौरभ गणेश शर्मा ने बताया कि जब सूर्य गोचरवश धनु और मीन में प्रवेश करते हैं तो इसे क्रमश: धनु संक्रांति व मीन संक्रांति कहा जाता है। सूर्य किसी भी राशि में लगभग 1 माह तक रहते हैं। सूर्य के धनु राशि व मीन राशि में स्थित होने की अवधि को ही ‘मलमास’ या ‘खरमास’ कहा जाता है। मलमास में सभी प्रकार के शुभ कार्य जैसे विवाह, मुंडन, सगाई, गृहारंभ व गृह प्रवेश के साथ व्रतारंभ एवं व्रत उद्यापन आदि वर्जित रहते हैं।
हिंदी पंचांग अनुसार इस वर्ष दिनांक 14 मार्च फाल्गुन शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्य के मीन राशि में गोचर के साथ ‘मलमास’ प्रारंभ होगा, जो दिनांक 13 अप्रैल 2024 चैत्र शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि तक रहेगा। ‘मलमास’ प्रभावी होने के कारण इस अवधि में समस्त शुभ कार्यों का निषेध रहेगा।ज्योतिषाचार्य पंडित सौरभ गणेश शर्मा ने बताया कि इस वर्ष 2024 में होलाष्टक 17 मार्च से 24 मार्च तक रहेगा। 25 मार्च 2024 को होली है। होलाष्टक के शाब्दिक अर्थ पर जायें, तो होला+अष्टक अर्थात होली से पूर्व के आठ दिन, जो दिन होता है, वह होलाष्टक कहलाता है। सामान्य रूप से देखा जाए तो होली एक दिन का पर्व न होकर पूरे नौ दिनों का त्यौहार है।
होलाष्टक के समय शुभ कार्य वर्जित होते हैं। यह फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी को लगता है। होलाष्टक फिर आठ दिनों तक रहता है और सभी शुभ मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं। यह दुलहंडी पर रंग खेलकर खत्म होता है। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी पर 2 डंडे स्थापित किए जाते हैं। जिनमें एक को होलिका तथा दूसरे को प्रह्लाद माना जाता है। इससे पूर्व इस स्थान को गंगा जल से शुद्ध किया जाता है। फिर हर दिन इसमें गोबर के उपल, लकड़ी घास और जलने में सहायक चीजे डालकर इसे बड़ा किया जाता है। पंडित शर्मा के अनुसार पौराणिक कथाओं एवं शास्त्रों में बताया गया है की होलाष्टक के दिन ही कामदेव ने शिव तपस्या को भंग किया था। इस कारण शिवजी अत्यंत क्रोधित हो गए थे। उन्होंने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था। हालांकि कामदेव ने देवताओ की इच्छा और उनके अच्छे के लिए शिव को तपस्या से उठाया था। कामदेव के भस्म होने से समस्त संसार शोक में डूब गया उनकी पत्नी रति ने शिव से विनती की वे उन्हें फिर से पुनर्जीवित कर दे तब भगवान भोलेनाथ से द्वापर में उन्हें फिर से जीवन देने की बात कही।
एक दूसरी कथा के अनुसार राजा हिरणकश्यप ने अपने पुत्र भक्त प्रह्लाद को भगवद् भक्ति से हटाने और हिरणकश्यप को ही भगवान की तरह पूजने के लिए अनेक यातनाएं दी, लेकिन जब किसी भी तरकीब से बात नहीं बनी तो होली से ठीक आठ दिन पहले उसने प्रह्लाद को मारने के प्रयास आरंभ कर दिए थे। लगातार आठ दिनों तक जब भगवान अपने भक्त की रक्षा करते रहे तो होलिका के अंत से यह सिलसिला थमा। इसलिये आज भी भक्त इन आठ दिनों को अशुभ मानते हैं। उनका यकीन है कि इन दिनों में शुभ कार्य करने से उनमें विघ्न बाधाएं आने की संभावनाएं अधिक रहती है। पंडित शर्मा के अनुसार ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होलाष्टक में सभी शुभ कार्य करना वर्जित रहते हैं, क्योंकि इन आठ दिवस ये 8 ग्रह उग्र रहते हैं। इन आठ दिनों में अष्टमी को चन्द्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मगल और पूर्णिमा को राहू उग्र रहते हैं। इसलिए इस अवधि में शुभ कार्य करने वर्जित हैं।
होलाष्टक में न करें ये कार्य –
1. विवाह: होली से पूर्व के 8 दिनों में भूलकर भी विवाह न करें। यह समय शुभ नहीं माना जाता है, जब तक कि कोई विशेष योग आदि न हो।
2. नामकरण एवं मुंडन संस्कार: होलाष्टक के समय में अपने बच्चे का नामकरण या मुंडन संस्कार कराने से बचें।
3. भवन निर्माण: होलाष्टक के समय में किसी भी भवन का निर्माण कार्य प्रारंभ न कराएं। होली के बाद नए भवन के निर्माण का शुभारंभ कराएं।
4. हवन-यज्ञ: होलाष्टक में कोई यज्ञ या हवन अनुष्ठान करने की सोच रहे हैं, तो उसे होली बाद कराएं। इस समय काल में कराने से आपको उसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होगा।
5. नौकरी: होलाष्टक के समय में नई नौकरी ज्वॉइन करने से बचें। अगर होली के बाद का समय मिल जाए तो अच्छा होगा। अन्यथा किसी ज्योतिषाचार्य से मुहूर्त दिखा लें।
6. भवन, वाहन आदि की खरीदारी: संभवत हो तो होलाष्टक के समय में भवन, वाहन आदि की खरीदारी से बचें। शगुन के तौर पर भी रुपए आदी न दें। होलाष्टक में पूजा-अर्चना की के लिए किसी भी प्रकार की मनाही नही होती। होलाष्टक के समय में अपशकुन के कारण मांगलिक कार्यों पर रोक होती है। हालांकि होलाष्टक में भगवान की पूजा-अर्चना की जाती है। इस समय में आप अपने ईष्ट देव की पूजा-अर्चना, भजन, आरती आदि करें, इससे आपको शुभ फल की प्राप्ति होगी।
पंडित सौरभ गणेश शर्मा, ज्योतिषाचार्य, बालाजी ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र शास्त्री कॉलोनी स्टेशन रोड सीहोर 9229112381