आपातकाल की वो खौफनाक दास्तान, जब 16 साल के शिवराज को मिली थीं बर्बर यातनाएं, दादी के अंतिम दर्शन तक पर लगा दी थी रोक

सीहोर। आज देश आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर उस दौर को याद कर रहा है, जिसे स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है। इस मौके पर देश के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोशल मीडिया के माध्यम से उन 19 महीनों के अपने खौफनाक और संघर्षपूर्ण संस्मरणों को साझा किया है। शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि किस तरह महज 16 साल की उम्र में उन्हें लोकतंत्र की रक्षा के लिए जेल जाना पड़ा और वहां उन्होंने तथा उनके साथियों ने किस कदर अमानवीय यातनाएं झेलीं।
शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि 25 जून 1975 को जब देश में आपातकाल लागू हुआ, तब वे महज 16 वर्ष के थे और अपने मॉडल स्कूल के छात्र संघ अध्यक्ष थे। उस दौर में देश के भीतर बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और दोषपूर्ण शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ जयप्रकाश नारायण जेपी का आंदोलन चरम पर था। इस आंदोलन से प्रभावित होकर वे भी लोकतंत्र की बहाली के संघर्ष में कूद पड़े। उन्होंने सरकार की तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाई, गुप्त रूप से पर्चे बांटे और विरोध प्रदर्शनों की अगुवाई की। इसी के चलते तत्कालीन दमनकारी सरकार ने उन्हें पहले डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट एंड रूल्स और बाद में कुख्यात मीसा आंतरिक सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
बर्फ की सिल्लियां, करंट और लाठियों की बरसात
अपने संस्मरणों में जेल के भीतर की भयावहता का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा कि वह दौर अमानवीय अत्याचारों की पराकाष्ठा था। पुलिस और प्रशासन द्वारा आंदोलनकारियों को झुकाने के लिए बिजली के करंट लगाए जाते थे, कडक़ड़ाती ठंड में बर्फ की सिल्लियों पर लिटाया जाता था और बेरहमी से मारपीट कर उनके हाथ-पैर तक तोड़ दिए जाते थे।
उन्होंने बताया कि राजनीतिक कैदियों को मोटी सलाखों वाली छोटी और अंधेरी कोठरियों में बंद रखा जाता था। कई बार 15 से 20 संतरी एक साथ मिलकर लाठियों और बेंतों से बंदियों पर टूट पड़ते थे। खून से लथपथ और बेहोश होने के बाद भी उन पर दया नहीं की जाती थी। सिर फटना और 16 से 18 टांके आना उस समय जेल में एक आम बात बन चुकी थी। देश में न कोई अपील, न कोई वकील और न कोई दलील की स्थिति थी, नागरिकों के सारे मौलिक अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी छीन ली गई थी।
दादी के निधन पर भी नहीं मिली पैरोल
जेल में बिताए गए उन 19 महीनों के दौरान शिवराज सिंह चौहान को एक ऐसा जख्म मिला जो आज भी हरा है। जब वे जेल की सलाखों के पीछे थे, तब उनकी दादी गंभीर रूप से बीमार हो गईं और इलाज के दौरान उनका निधन हो गया। चौहान ने भावुक होते हुए लिखा, जब मैं जेल में था, मेरी दादी का निधन हो गया। लेकिन तत्कालीन क्रूर और संवेदनहीन शासन ने मुझे और मेरे जैसे कई अन्य नेताओं को अपने परिवार के सदस्यों के अंतिम दर्शन तक में शामिल होने की अनुमति नहीं दी।
कुर्सी बचाने की भूख
पूर्व मुख्यमंत्री ने सीधे तौर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि आपातकाल लागू करने के पीछे देश की सुरक्षा का कोई कारण नहीं था। यह सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने और सत्ता में बने रहने की भूख का नतीजा था, जिसके लिए पूरे देश को एक बड़े जेलखाने में तब्दील कर दिया गया। उन्होंने पूरे संविधान की धज्जियां उड़ाई थीं और चौथे स्तंभ की आवाज को दबाया था।

ऐसे हुई सेवा यात्रा की शुरुआत
चौहान के अनुसार जेल में बिताए गए उन 19 महीनों ने उनके जीवन की दिशा और दशा को हमेशा के लिए बदल दिया। जेल के भीतर उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारकों और देश के बड़े नेताओं का सानिध्य मिला, जिससे उनके विचारों को एक नई परिपक्वता मिली। वहां बंद रहते हुए उन्होंने संकल्प लिया था कि सत्ता भले ही कितनी भी तानाशाह हो जाए, लेकिन जनता के अधिकारों को कभी खत्म नहीं किया जा सकता। उन्होंने खुद से वादा किया कि यदि भविष्य में कभी उन्हें ईश्वर ने सत्ता या शक्ति दी तो वे उसका उपयोग शासन करने के लिए नहीं बल्कि जनता की सेवा के लिए करेंगे। जेल से रिहा होने के बाद ही वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बने और सक्रिय सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की।
लोकतंत्र सेनानियों को दिया उनका हक
शिवराज सिंह चौहान का मानना है कि आपातकाल के खिलाफ लडऩे वाले लोग वास्तव में देश की आजादी की तीसरी लड़ाई लड़ रहे थे। यही कारण है कि जब वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने आपातकाल के दौरान जेलों में यातनाएं सहने वाले मीसा बंदियों को लोकतंत्र सेनानी का आधिकारिक दर्जा दिया। इसके साथ ही उन्होंने इन सेनानियों के लिए सम्मान निधि, मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं और राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि जैसी ऐतिहासिक कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत की, ताकि उनके त्याग को हमेशा याद रखा जा सके।



