
सुमित शर्मा, सीहोर
प्रदेश के निगम-मंडल, प्राधिकरण, बोर्ड एवं आयोगों में हो रही नियुक्तियों में इस बार सीहोर जिले के नेताओं को तवज्जों नहीं मिल रही है। वर्तमान में सीताराम यादव सदस्य अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग एवं निर्मला बारेला अध्यक्ष मप्र आदिवासी वित्त एवं विकास निगम के पास ही पद हैं। एक समय था, जब सीहोर जिले खासकर बुधनी विधानसभा क्षेत्र के नेताओं के पास एक दर्जन से अधिक पद हुआ करते थे, लेकिन वर्तमान में ऐसी स्थितियां नहीं हैं। वेयर हाउसिंग कारपोरेशन, वन विकास निगम, मार्कफेड जैसे अहम पदों पर बुधनी विधानसभा के नेताओं ने वर्षों तक पदभार संभाला, लेकिन इस बार जो निगम-मंडल, प्राधिकरण, बोर्ड, आयोगों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सदस्यों के नाम आए हैं उनमें सीहोर जिले से एक भी नाम नहीं आया।
2005 से 2023 तक नेताओं के पास थे कई अहम पद-
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान वर्ष 2005 में मुख्यमंत्री बने। इसके बाद उन्होंने बुधनी विधानसभा से ही उपचुनाव लड़ा एवं जीते। उस समय बुधनी विधानसभा में राजेंद्र सिंह राजपूत विधायक थे। उन्होंने शिवराज सिंह चौहान के लिए सीट खाली की थी। इसके बाद शिवराज सिंह चौहान ने राजेंद्र सिंह राजपूत को वेयर हाउसिंग कारपोरेशन का अध्यक्ष भी बनाया था। इसी तरह गुरूप्रसाद शर्मा को मप्र राज्य वन विकास निगम का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। बुधनी से वर्तमान विधायक रमाकांत भार्गव मार्कफेड के अध्यक्ष रहे। शिव चौबे मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार के तौर पर पदस्थ रहे। वे माइनिंग कारपोरेशन के भी अध्यक्ष रहे। बाद में उन्हें राज्य सामान्य निर्धन वर्ग कल्याण आयोग का अध्यक्ष भी बनाया गया। महिला आयोग में भी बुधनी विधानसभा की भाजपा नेत्री को पद मिला तो वहीं सिलाई कला बोर्ड, स्वर्ग कला बोर्ड में अध्यक्ष पद पर बुधनी विधानसभा के नेता काबिज रहे। कई अन्य महत्वपूर्ण पदों पर भी बुधनी विधानसभा एवं सीहोर जिले के नेताओं को तवज्जो मिली, लेकिन इस बार ऐसी स्थिति नहीं है। सीहोर जिले के बुधनी विधानसभा से सिर्फ एक महिला नेत्री निर्मला बारेला के पास ही पद हैं। उनका कार्यकाल भी जल्द ही समाप्त होने वाला है। सीहोर के कद्दावर नेता पूर्व जिलाध्यक्ष सीताराम यादव अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य हैं।
नेताओं की सक्रियता भी नहीं आई काम-
सीहोर जिले के भाजपा नेता निगम-मंडल, आयोग, प्राधिकरण, बोर्डों में पद पाने के लिए लगातार सक्रिय रहे। भोपाल से लेकर दिल्ली तक की दौड़ भी लगाई। अपने आंकाओं से भी सिफारिश करवाई, लेकिन फिर भी उन्हें पद नहीं मिल सके। हालांकि अब भी कई नियुक्तियां होनी हैं। ऐसे में नेताओं को उम्मीद है कि इस बार उनकी किस्मत भी खुलेगी। फिलहाल वे उम्मीदों के भरोसे हैं।