हीमोफीलिया पीडि़त बच्चों को 21 दिन से नहीं मिला इंजेक्शन, जिला अस्पताल के सामने परिवार सहित किया चक्काजाम

सीहोर। जिला अस्पताल में जीवन रक्षक दवाओं की कमी और प्रशासनिक अनदेखी के खिलाफ सोमवार को एक बेबस पिता का दर्द सडक़ पर छलक आया। आष्टा तहसील के ग्राम गुराडिय़ा रूपचन्द्र निवासी श्रवण कुमार मेवाड़ा ने अपने दो मासूम बच्चों की जान बचाने के लिए पूरे परिवार के साथ जिला चिकित्सालय के सामने मुख्य मार्ग पर बैठकर चक्काजाम कर दिया। करीब 21 दिनों से बच्चों के लिए जरूरी इंजेक्शन न मिलने से परेशान पिता ने यह कदम उठाया। व्यस्त मार्ग पर अचानक हुए इस प्रदर्शन के कारण सडक़ के दोनों ओर वाहनों की लंबी-लंबी कतारें लग गईं और राहगीर परेशान होते नजर आए।
जानकारी के अनुसार श्रवण कुमार मेवाड़ा के दो बच्चे हीमोफीलिया जैसी गंभीर अनुवांशिक बीमारी से पीडि़त हैं। इस बीमारी में शरीर में चोट लगने या रक्तस्राव होने पर खून का थक्का नहीं जमता, जो जानलेवा साबित हो सकता है। डॉक्टरों ने बच्चों के इलाज के लिए नियमित रूप से फैक्टर-8 इंजेक्शन लगाने की सलाह दी है। बच्चों का इलाज पहले जिला अस्पताल में ही चल रहा था, लेकिन पिछले 21 दिनों से अस्पताल के मुख्य दवा स्टोर में यह जीवन रक्षक इंजेक्शन उपलब्ध नहीं है।
पिता ने मांगी मुंबई जाने के लिए मदद
पीडि़त पिता श्रवण कुमार ने बताया कि वे वर्तमान में बेरोजगार हैं और उनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। यह इंजेक्शन निजी मेडिकल स्टोर्स पर बेहद महंगा मिलता है, जिसे खरीद पाना उनके बजट से बाहर है। उन्होंने बताया कि यह दवा सिर्फ सीहोर ही नहीं, बल्कि भोपाल के सरकारी अस्पतालों में भी उपलब्ध नहीं है। परेशान होकर श्रवण कुमार ने बीते 19 जून को कलेक्टर को एक आवेदन भी सौंपा था, जिसमें उन्होंने मांग की थी कि यदि मध्य प्रदेश में यह दवा उपलब्ध नहीं है तो उन्हें बच्चों के इलाज के लिए मुंबई ले जाने हेतु 15 दिनों की आर्थिक सहायता प्रदान की जाए। जब कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई और बच्चों की जान पर बन आई तो पीडि़त पिता बच्चों के साथ सडक़ पर ही धरने पर बैठ गए।
चक्काजाम से लगा लंबा जाम, मौके पर पहुंचे सिविल सर्जन
अस्पताल के ठीक सामने चक्काजाम और हंगामे की खबर मिलते ही पुलिस और जिला अस्पताल के सिविल सर्जन तत्काल मौके पर पहुंचे। उन्होंने सडक़ पर बैठे पीडि़त परिवार से बात की उनकी बेबसी को समझा और उन्हें ढांढस बंधाया। सिविल सर्जन ने पीडि़त पिता को जल्द से जल्द फैक्टर-8 इंजेक्शन की व्यवस्था कराने का ठोस लिखित/मौखिक आश्वासन दिया, जिसके बाद प्रदर्शन शांत हुआ और यातायात बहाल किया जा सका।
सरकारी दावों पर खड़े हुए बड़े सवाल
इस संवेदनशील घटना ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवा वितरण के दावों और जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। नागरिकों का कहना है कि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे गरीब मरीजों के प्रति प्रशासन को अधिक गंभीर और संवेदनशील होना चाहिए ताकि किसी को इलाज के लिए सडक़ पर न बैठना पड़े।



