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अमर शहीद कुंवर चैन सिंह के शहादत दिवस पर कल दिया जाएगा गार्ड ऑफ ऑनरश्, राज्य मंत्री होंगे शामिल

सीहोर। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारत की पहली सशस्त्र क्रांति का इतिहास सीहोर की पावन माटी से गहराई से जुड़ा हुआ है। देश में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से 33 वर्ष पूर्व ही सन् 1824 में मालवा के अमर योद्धा और नरसिंहगढ़ रियासत के युवराज कुंवर चैन सिंह ने अंग्रेजों की गुलामी को ठुकराते हुए सशस्त्र विद्रोह कर दिया था। 24 जुलाई 1824 को अंग्रेजी फौज से लोहा लेते हुए वे अपने निष्ठावान साथियों संग वीरगति को प्राप्त हुए थे। अमर शहीद कुंवर चैन सिंह के 202वें शहादत दिवस के अवसर पर कल शुक्रवार 24 जुलाई को सीहोर स्थित उनके स्मारक (छतरी) पर राजकीय सम्मान के साथ गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाएगा।

कलेक्टर बालागुरू केण् के निर्देशानुसार 24 जुलाई को सुबह 11.30 बजे दशहरा मैदान स्थित शहीद कुंवर चैन सिंह स्मारक पर अमर शहीद कुंवर चैन सिंह और उनके वीर साथियों की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा एवं गार्ड ऑफ ऑनर का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में प्रदेश के मछुआ कल्याण एवं मत्स्य विकास राज्य मंत्री नारायण सिंह पंवार शामिल होंगे। तय कार्यक्रम के अनुसार राज्य मंत्री सुबह 11 बजे सीहोर पहुंचकर कुंवर चैन सिंह की छतरी पर आयोजित श्रद्धांजलि एवं गार्ड ऑफ ऑनर कार्यक्रम में भाग लेंगे। इसके बाद वे दोपहर 12.30 बजे चिंतामन गणेश मंदिर में दर्शन पूजन कर दोपहर 1.00 बजे भोपाल के लिए प्रस्थान करेंगे। आयोजन में जिले के जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस बल और बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक शहीदों को नमन करेंगे।
गुलामी की शर्तों को ठुकराकर रचा था इतिहास
स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर शहीद कुंवर चैन सिंह की शहादत स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। सन् 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी और भोपाल के नवाब के बीच हुए समझौते के बाद अंग्रेजों ने सीहोर में अपनी सैनिक छावनी बनाई और पॉलिटिकल एजेंट मैडॉक को राजनीतिक अधिकार सौंप दिए। कुंवर चैन सिंह ने इस व्यवस्था को गुलामी का प्रतीक मानकर स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत कर दी।
अंग्रेजों ने उन पर दबाव बनाने के लिए कई कठिन शर्तें रखीं, जिन्हें स्वाभिमानी कुंवर चैन सिंह ने ठुकरा दिया। 24 जुलाई 1824 को जब अंग्रेजों ने उन्हें कैम्प से बाहर जाने से रोका तो उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंची और वे आदेशों की अवहेलना कर बाहर निकल आए।
5 हजार अंग्रेजी सैनिकों से भिड़ गए थे 43 शूरवीर
अंग्रेजी हुकूमत के एजेंट मैडॉक ने सीहोर, डाबरी, भोपाल और होशंगाबाद छावनियों से लगभग 5 से 6 हजार सैनिकों की विशाल फौज बुलवा ली। 24 जुलाई 1824 की रात अंग्रेजी सेना ने कुंवर चैन सिंह के कैम्प को चारों तरफ से घेरकर अचानक हमला बोल दिया।
कुंवर चैन सिंह ने अपने सबसे भरोसेमंद साथियों हिम्मत खां और बहादुर खां सहित मात्र 43 शूरवीर सैनिकों के साथ विशाल अंग्रेजी फौज का अद्वितीय वीरता से सामना किया और अंतत: मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनके इस बलिदान ने पूरे देश में क्रांति की अलख जगा दी थी।
2015 से शुरू हुई गार्ड ऑफ ऑनर की परंपरा
उल्लेखनीय है कि मालवा के इस प्रथम अमर शहीद के अतुलनीय योगदान और बलिदान को सम्मान देने के लिए मध्य प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2015 से सीहोर स्थित उनकी छतरी पर प्रतिवर्ष 24 जुलाई को राजकीय सम्मान के साथ गार्ड ऑफ ऑनर देने की परंपरा की शुरुआत की गई थी, जो अनवरत जारी है।

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