मां कोई जायदाद नहीं, जो महीनों में बांटी जाए… सीहोर पुलिस पंचायत ने सुलझाए रिश्तों के उलझे तार
जिस मां ने उंगली पकडक़र चलना सिखाया, आज उसी मां को अपने ही घर में रहने के लिए महीनों के हिसाब से मोहलत मिल रही है

सीहोर। पुलिस अधीक्षक सोनाक्षी सक्सेना के निर्देशन में संचालित सीनियर सिटीजन पुलिस पंचायत इन दिनों समाज की बदलती सोच और टूटते मानवीय रिश्तों के कई कड़वे सच सामने ला रही है। पंचायत की हालिया बैठक में कई मामलों पर सुनवाई हुई, लेकिन इनमें से एक प्रकरण ने वहां मौजूद हर शख्स का दिल झकझोर कर रख दिया। यह मामला था चार बेटों द्वारा अपनी 75 वर्षीय बीमार बुजुर्ग मां की परवरिश को तीन-तीन महीने के टुकड़ों में बांटने का।
जब मां को बना दिया गया टाइम-टेबल का हिस्सा
सीहोर के एक ग्रामीण इलाके के 65 वर्षीय बुजुर्ग दम्पति का यह मामला किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। बुजुर्ग पिता और उनकी बीमार मां के चार बेटे और दो बेटियां हैं। गांवों और भोपाल में संपत्ति भी है, जिसके बंटवारे को लेकर घर में हमेशा कलह और मारपीट की स्थिति बनी रहती है। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि कोर्ट में भरण-पोषण और मुकदमों के केस चल रहे हैं।
जब घर में माता-पिता की देखभाल को लेकर सहमति नहीं बनी तो उन चारों बेटों ने ममता के आंचल को भी कागजी बांट की तरह तौल लिया। फैसला यह हुआ कि मां तीन-तीन महीने बारी-बारी से चारों बेटों के पास रहेंगी। यानी जिस मां ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को पालने में खपा दी, आज बुढ़ापे में उसका कोई एक स्थायी आशियाना नहीं बचा, वह हर तीन महीने बाद अपना बिस्तर समेटकर एक बेटे से दूसरे बेटे के घर भटकने को मजबूर थी। इस क्रूर व्यवस्था में भी आए दिन विवाद और परेशानियां सामने आ रही थीं।
पंचायत का संवेदनशील हस्तक्षेप
सीनियर सिटीजन पुलिस पंचायत के कोर कमेटी सदस्य अनिल पालीवाल, साधु राम शर्मा और कमल सिंह ठाकुर (अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक डॉ. प्रशांत चौबे के मार्गदर्शन में) ने जब इस मामले को सुना] तो उन्होंने बच्चों को कड़ा आईना दिखाया।
पंचायत ने स्पष्ट शब्दों में समझाया कि जिन बच्चों को माता-पिता ने खुद कठिनाइयां झेलकर पाला-पोसा, आज वही बच्चे इतनी बुजुर्ग मां को अपने पास रखने के नाम पर बांट रहे हैं, यह बिल्कुल भी उचित नहीं है।
आखिरकार पंचायत की समझाइश और काउंसलिंग के बाद परिवार में यह नई सहमति बनी कि गांव की भूमि को छह भागों में बांटकर सभी उसका उपयोग करेंगे, माता-पिता के भरण-पोषण का जिम्मा मिलकर उठाया जाएगा और सबसे अहम बात, मां जहां चाहें, अपनी मर्जी से और बिना किसी पाबंदी के रह सकेंगी। भविष्य में कोई विवाद न करने पर दोनों पक्षों ने हामी भरी।
फिल्मों जैसी हकीकत, सीहोर में
इस घटना को देखकर बॉलीवुड की मशहूर फिल्म बागवान की याद ताजा हो गई। इस फिल्म में भी बुजुर्ग माता-पिता (अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी) के बेटों ने उन्हें आपस में महीनों के हिसाब से बांटने का अमानवीय फैसला किया था, जिससे माता-पिता को भारी मानसिक प्रताडऩा झेलनी पड़ी थी।
फर्क सिर्फ इतना है कि पर्दे पर यह कहानी काल्पनिक होती है, लेकिन सीहोर की इस पुलिस पंचायत में यह एक कड़वी और असली सच्चाई बनकर सामने आई, जहां पुलिस ने सिर्फ कागजी कार्रवाई नहीं की, बल्कि रिश्तों के मरते हुए जज्बात को भी जिलाने की कोशिश की।
पंचायत में अन्य तीन मामलों का भी निपटारा
बहू-बेटियों के हक की लड़ाई: 75 वर्षीय बुजुर्ग महिला पिछले 40 वर्षों से अपने पिता के घर में रह रही थी, जिसे उसकी छोटी बहन मकान खाली करने के लिए लगातार धमका रही थी। पंचायत ने स्पष्ट किया कि इतने लंबे समय से काबिज बुजुर्ग महिला को जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता। वसीयत का मामला सिविल कोर्ट का है, पुलिस या परिजन दबाव नहीं बना सकते।
रास्ते के विवाद: ग्रामीण और मंडी थाना क्षेत्र के दो अलग-अलग मामलों में पड़ोसियों द्वारा बुजुर्गों के घर आने-जाने का रास्ता रोक दिया गया था तथा घर के सामने कचरा फेंका जा रहा था। पंचायत की समझाइश पर अनावेदक पक्षों ने अपनी गलती मानते हुए तुरंत रास्ता खोल दिया और भविष्य में कभी ऐसी शिकायत न मिलने का प्रण लिया।



