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भीषण गर्मी में बच्चों के लिए ‘प्राकृतिक एसी’ बनी ‘मां की बगिया’, महुआखेड़ी तकीपुर स्कूल की अनूठी पहल

सीहोर। जहां एक ओर नौतपे की भीषण गर्मी और तपिश से लोग बेहाल हैं, वहीं दूसरी ओर जिला मुख्यालय के समीपस्थ शासकीय माध्यमिक विद्यालय महुआखेड़ी तकीपुर में बच्चों के लिए एक अनोखी और ठंडी पाठशाला तैयार की गई है। यहां चल रहे समर कैंप के दौरान स्कूल परिसर में विकसित की गई मां की बगिया बच्चों के आकर्षण का केंद्र बन गई है। बांस और हरी-भरी बेलों से तैयार की गई एक इको फ्रेंडली झोपड़ी इस कडक़ती धूप में भी ‘प्राकृतिक एसी’ का अहसास करा रही है, जहां बच्चे खेल-खेल में पर्यावरण संरक्षण के पाठ सीख रहे हैं।
स्कूल में तैयार की गई यह अनूठी झोपड़ी पूरी तरह इको फ्रेंडली है। बांस से बनी इस ग्रीन हाउस झोपड़ी की छत को हरी-भरी बेलों से ढका गया है, जिसके चारों तरफ घने और छायादार पेड़ लगे हैं। इसके कारण यहां का तापमान बाहर के मुकाबले काफी कम और शीतल रहता है। बच्चों के बैठने के लिए भी यहां कबाड़ से जुगाड़ तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। पुराने टायरों, लकड़ी और बांस की मदद से रंग-बिंरगी व बेहद आकर्षक कुर्सियां बनाई गई हैं, जिन पर बैठकर बच्चे आनंद लेते हैं।
पक्षियों का कोना और पौधों की नर्सरी
बगिया में न सिर्फ बच्चों बल्कि बेजुबान पक्षियों के संरक्षण का भी पूरा ध्यान रखा गया है। परिसर में पक्षियों का कोना विकसित किया गया है, जहां मिट्टी के सकोरों में नियमित रूप से दाना और पानी रखा जाता है। विद्यालय के पेड़ों पर भी जल पात्र बांधे गए हैं और पक्षियों के बैठने के लिए बांस के सुंदर झूले लगाए गए हैं, जिससे दिनभर यह परिसर पक्षियों की चहचहाहट से गूंजता रहता है। इसी झोपड़ी के नीचे एक छोटी सी पौध नर्सरी भी तैयार की गई है।
नवाचारी शिक्षण और जैव विविधता का पाठ
इस प्राकृतिक और हरियालीमय वातावरण के बीच बच्चे झोला लाइब्रेरी की किताबों के माध्यम से ज्ञान अर्जित कर रहे हैं। समर कैंप में बच्चे बड़े उत्साह के साथ प्रेरक कहानियां, कविताएं, चित्रकला और ड्राइंग सीख रहे हैं। इसके साथ ही उन्हें कई तरह की खेल गतिविधियां भी कराई जा रही हैं।

बच्चों में बढ़ रहा आत्मविश्वास और संवेदनशीलता
स्कूल के नवाचारी शिक्षक सतीश त्यागी ने बताया कि इस पूरी पहल का बच्चों के मन-मस्तिष्क पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। बच्चे अपनी शैक्षणिक गतिविधियों के साथ-साथ पौधों में पानी डालने और पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करने का काम खुद बड़े उत्साह से करते हैं। इससे नन्हे-मुन्ने बच्चों में पेड़, पौधे और पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता और प्रेम का विकास हो रहा है। साथ ही उनका आत्मविश्वास और मनोबल भी बढ़ रहा है, जिससे वे भविष्य में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक नागरिक बन सकेंगे।

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