उत्साह के साथ मना भुजरिया पर्व, निभाई गई परम्पराएं

एक-दूसरे को भुजरिया देकर मिले गले, छोटो ने लिया बड़ों से आशीर्वाद, खेले गए डंडे

सीहोर। जिलेभर में भुजरिया का पर्व उत्साह और परंपरानुसार मनाया गया। इस दौरान लोग एक-दूसरे को भुजरिया देकर गले मिले तो वहीं छोटों ने बड़ी से आशीर्वाद लिया। भुजरिया पर्व पर कई परंपराएं भी निभाई गई। इस दौरान जहां डंडे खेले गए तो वहीं भुजरिया का पूजन है। इसके बाद भुजरिया को नदी, तालाबों में विसर्जित किया गया। जिलेभर में भुजरिया पर्व की धूम रही।
रक्षाबंधन के अगले दिन भुजरिया का पर्व उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। जिला मुख्यालय सहित जिले के अन्य नगरों एवं ग्रामीण क्षेत्रों में भुजरिया पर्व मनाया गया। इस दौरान गांव-गांव में कई परंपराएं भी निभाई गईं। कई स्थानों पर ग्रामीणों ने डंडे खेले तो वहीं खेल भी हुए। इसके बाद शाम को भुजरिया जुलूस भी निकले। इसके बाद लोगों के एक दूसरे को भुजरिया दिए, गले मिले, आशीर्वाद भी लिया।
भुजरिया मनाने की परंपरा –
इस पर्व के पीछे कई लोक मान्यताएं हैं, लेकिन इसका सबसे प्रमुख भाव अच्छी वर्षा, अच्छी फसल और परिवार एवं समाज की खुशहाली की कामना है।
बरसात के मौसम में जब खेतों में हरियाली छाने लगती है, तब अंकुरित अनाज के रूप में भुजरिया प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम बनती है। ग्रामीण समाज में अन्न और वर्षा जीवन का आधार रहे हैं, इसलिए भुजरिया का संबंध सीधे कृषि और प्रकृति से जुड़ गया। मध्य प्रदेश के कई क्षेत्रों में भी भुजरिया- कजलियां को लोक-संस्कार, पारंपरिक आस्था और सामाजिक उत्साह का प्रतीक माना जाता है। भुजरिया पर्व की एक प्रसिद्ध लोकमान्यता बुंदेलखंड के वीर योद्धाओं आल्हा और ऊदल से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि भुजरिया की परंपरा का संबंध महोबा के आल्हा-ऊदल और उनकी वीरगाथाओं से रहा है। मध्य प्रदेश के भिंड जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट भी भुजरिया मेले को आल्हा और ऊदल के नाम से संबद्ध बताती है।
लोककथाओं में यह भी कहा जाता है कि आल्हा की बहन चंदा के स्वागत से भुजलिया देने की परंपरा जुड़ी थी। हालांकि यह बात लोकमान्यता है, इसे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि लोकपरंपरा के रूप में देखना उचित है। इसी कारण कई स्थानों पर भुजरिया पर्व के साथ आल्हा गायन, दंगल और पारंपरिक खेलों की परंपरा भी देखने को मिलती है।

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