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पढ़े सीवन नदी का रोचक इतिहास…

सीहोर। सीवन नदी मात्र एक जलधारा ही नहीं है, बल्कि यह सीहोर को सांस्कृतिक पहचान देती है। इस नदी के तट अपने प्राचीन मंदिरों व स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों के कारण ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। सीहोर का प्राचीन नाम ‘सिद्धपुर’ है। सीवन नदी के तट पर प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों और संतों ने तपस्या की है। प्राचीन काल से ही इस नदी के तट लोगों की आस्था के केंद्र रहे हैं, जहां विभिन्न देवी-देवताओं और नंदी महाराज की मूर्तियां व ऐतिहासिक छतरियां स्थित हैं।
1857 की क्रांति और वीरों का बलिदान
सीवन नदी के तट का इतिहास भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और दुखद अध्याय समेटे हुए है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सीहोर ब्रिटिश छावनी का एक प्रमुख केंद्र था। 14 जनवरी 1858 को, जनरल ह्यूरोज के आदेश पर 356 भारतीय क्रांतिकारियों को जेल से निकालकर इसी नदी के किनारे सैकड़ाखेड़ी (चांदमारी मैदान) ले जाया गया था। इन सभी देशभक्तों को नदी के तट पर एक साथ खड़ा कर गोलियों से भून दिया गया था। इस शहादत के कारण यह स्थान एक पवित्र स्मारक और तीर्थ के रूप में याद किया जाता है। इसे प्रदूषण से बचाने और एक धरोहर के रूप में संरक्षित करने के लिए स्थानीय प्रशासन और जनता द्वारा सीवन नदी के गहरीकरण और सौंदर्यीकरण के विशेष अभियान भी चलाए गए हैं। यह नदी सीहोर के प्राचीन गौरव और स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों के बलिदान की मूक साक्षी है। सीवन नदी का उद्गम सैकड़ाखेड़ी के पास स्थित पहाड़ियों और जलधाराओं से है। सीवन नदी की लंबाई लगभग 19 किमी है। शहरी क्षेत्र सीहोर नगरीय सीमा के भीतर इस नदी की कुल लंबाई लगभग 8 किमी है। इसी शहरी हिस्से के दोनों ओर मुख्य आबादी बसती है और नदी पर सात प्रमुख पुल बने हुए हैं। सीहोर शहर और उसके आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों से बहते हुए अंततः पार्वती नदी में जाकर मिल जाती है।
जल संरक्षण और जीर्णोद्धार अभियान 
नदी के अस्तित्व को बचाने और इसे पुनर्जीवित करने के लिए यह पहला अभियान नहीं है। इसके पहले भी कई बड़े जन-आंदोलन चलाए गए हैं। स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संस्थाओं और प्रशासन ने मिलकर नदी की गाद (कीचड़) निकालने का बड़ा कार्य किया। नदी की जलभराव क्षमता बढ़ाने के लिए पोकलेन मशीनों और श्रमदान के जरिए इसके तल को गहरा किया गया।
सौंदर्यीकरण और घाट निर्माण: जनता घाट सहित अन्य तटों पर पक्के घाटों का निर्माण, रिटेनिंग वॉल (सुरक्षा दीवार) और लाइटिंग की व्यवस्था की गई।
प्रदूषण नियंत्रण : शहर के गंदे नालों को नदी में मिलने से रोकने के लिए वाटर ट्रीटमेंट और डायवर्जन योजनाओं पर काम किया जा रहा है।
सीवन नदी के आस-पास स्थित हैं प्राचीन मंदिर
प्राचीन सहस्त्रलिंगम महादेव मंदिर : सीवन नदी के तट पर स्थित यह ऐतिहासिक शिव मंदिर लगभग 300 वर्ष से अधिक पुराना माना जाता है। मान्यता है कि मंदिर का मुख्य शिवलिंग स्वयं सीवन नदी से ही प्रकट हुआ था।
1000 शिवलिंगों का समागम: इस एक बड़े शिवलिंग की सतह पर 1,008 छोटे-छोटे शिवलिंग प्राकृतिक रूप से उकेरे हुए हैं। पूरे भारत और नेपाल को मिलाकर ऐसे गिने-चुने शिवलिंग ही मौजूद हैं।
धार्मिक मान्यता: कहा जाता है कि सावन के महीने में यहाँ सिर्फ एक बार मूल मंत्र का जाप करने से 1008 बार जाप करने जितना पुण्य फल मिलता है।
हनुमान गढ़ी और हनुमान फाटक मंदिर : सीवन नदी के तट पर बजरंगबली को समर्पित प्राचीन मंदिर स्थित हैं। इस मंदिर का इतिहास पेशवा कालीन (मराठा साम्राज्य) माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यहां काले पहाड़ के पास हनुमान जी की प्रतिमा नदी में विलीन अवस्था में थी, जिसे बाद में स्वप्न में मिले निर्देश के बाद नदी से निकालकर आदरपूर्वक स्थापित किया गया।
कुबेरेश्वर धाम कांवड़ यात्रा का केंद्र बिंदु
प्रसिद्ध कथा वाचक भागवत भूषण पंडित प्रदीप मिश्रा के कारण देश भर में प्रसिद्ध कुबेरेश्वर धाम महादेव मंदिर धार्मिक रूप से सीवन नदी से सीधा जुड़ा हुआ है। प्रत्येक वर्ष सावन मास में आयोजित होने वाली प्रसिद्ध 11 किलोमीटर लंबी भव्य कांवड़ यात्रा सीवन नदी के तट से ही जल भरकर प्रारंभ होती है, जो पैदल चलते हुए कुबेरेश्वर धाम तक जाती है। इसमें शामिल होने के लिए देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु सीहोर आते हैं। चिंतामन सिद्धपुर गणेश मंदिर नदी तट से थोड़ी दूरी पर है। सीवन नदी की पौराणिक भूमि ‘सिद्धपुर’ की पहचान इसी मंदिर से जुड़ी है। इसका निर्माण लगभग 2600 वर्ष पूर्व सम्राट विक्रमादित्य ने करवाया था और बाद में मराठा पेशवा बाजीराव ने इसका जीर्णोद्धार किया।
ऋषियों की तपोभूमि 
सीहोर के प्राचीन गजेटियर और इतिहास के अनुसार, योग सूत्र के जनक महर्षि पतंजलि ने भी सीवन नदी के शांत और पवित्र वातावरण में कुछ समय ध्यान और तपस्या में व्यतीत किया था। लोक कथाओं के अनुसार, भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी ने भी अपने वनवास काल के दौरान इस क्षेत्र के जलस्रोतों और ऋषि आश्रमों का भ्रमण किया था।

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