सीहोर: धरना-प्रदर्शन की ’सियासत’, सरकार, सिस्टम को आंख दिखाते ’जनप्रतिनिधि’

सुमित शर्मा
लोकतंत्र में अन्याय के खिलाफ और अपने अधिकारों को पाने के लिए आमजन तो धरना-प्रदर्शन करते हैं। धरना-प्रदर्शन आमजनों के लिए वह हथियार होता है, जिसके माध्यम से वे अपनी बात सिस्टम तक पहुंचाते हैं, लेकिन जब सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधि, पदों पर आसीन नेता और मंत्री को ही अपनी सरकार, सिस्टम और अफसरशाही को आंख दिखाने के लिए धरना-प्रदर्शन करना पड़े या इसकी चेतावनी, धमकी देनी पड़े तो इससे लगता है कि यह सरकार और सिस्टम की ही नाकामी है। अफसरशाही भी बेलगाम है, क्योंकि जनप्रतिनिधियों की अफसर नहीं सुनते और अफसरों की कर्मचारी नहीं सुन रहे। ऐसे में उपर से नीचे तक पूरे सिस्टम को आंख दिखाने के लिए इस समय धरना-प्रदर्शन करना एवं उसकी चेतावनी देना सीहोर की सियासत में ट्रेंड बनता जा रहा है। पिछले कुछ समय से यह स्थिति लगातार बनी हुई है। दरअसल पिछले दिनों जहां सीहोर विधानसभा क्षेत्र में सड़कों की खस्ता हालत पर लोगों ने धरना-प्रदर्शन

दिया। इसकी भनक लगते ही विधायक सुदेश राय एवं नगर पालिका अध्यक्ष प्रिंस राठौर धरनास्थल पर पहुंचे। धरने पर बैठे लोगों को समझाईश दी, लेकिन इसका असर नहीं हुआ। मौके से ही अधिकारियों को फोन लगाए गए। इसके बाद विधायक और नगर पालिका अध्यक्ष ने लोगों के साथ धरना-प्रदर्शन पर बैठने की चेतावनी दी तो एक घंटे में सड़क की मरम्मत का काम शुरू हो गया। ऐसी ही स्थिति बुधनी विधानसभा क्षेत्र में भी बनी। दरअसल बुधनी विधानसभा क्षेत्र के कोसमी में आदिवासियों की जंगलों की जमीनों पर वन विभाग का बुलडोजर चला। कई आदिवासियों के खेतों में बने मकानों को तोड़ा गया। इसकी जानकारी केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चैहान को भी मिली। इसके बाद वे कोसमी पहुंचे और आदिवासियों को ढांढस बंधाया। बेघर हुए आदिवासियों को मकान बनाने का भरोसा भी दिलाया। मौके से ही मुख्य सचिव, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को फोन लगाकर स्थिति से अवगत कराया। मुख्यमंत्री से भी इस संबंध में चर्चा करने की बात कही, लेकिन आखिरकार यह स्थितियां क्यों बन रही है, यह सवाल इस समय सबसे ज्यादा मौजूं है।
सीहोर भाजपा संगठन की भी विफलता-
सीहोर जिला मध्यप्रदेश की राजनीति के केंद्रबिंदु में हमेशा से रहा है। सीहोर जिले की राजनीति केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चैहान के इर्द-गिर्द नजर आती है। वे 17 वर्षों तक सीहोर जिले की बुधनी विधानसभा सीट से जीतकर मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहे। इससे पहले विदिशा संसदीय सीट से सांसद भी रहे। पिछले 17 वर्षों में ऐसी स्थिति कभी नहीं बनी, लेकिन पिछले कुछ समय से सीहोर में अफसरशाही जनप्रतिनिधियों पर भारी पड़ रही है। इसे सीहोर भाजपा संगठन की भी विफलता मान सकते हैं, क्योंकि भाजपा संगठन के जिम्मेदार न तो आदिवासियों के बीच में पहुंच रहे हैं, न ही लोगों के फोन उठाते हैं। हां आदिवासियों के बीच रहकर राजनीति रोटी सेंकने वाले जरूर उनके हितैषी बने फिर रहे हैं, लेकिन वे भी इन्हें साधने में विफल हो रहे हैं।

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