
सीहोर। भैरूंदा तहसील अंतर्गत कोसमी गांव में वन विकास निगम द्वारा की गई कार्रवाई से आक्रोशित आदिवासी समाज का आंदोलन अब और उग्र रूप धारण कर चुका है। लगातार चार दिनों 11 से 14 अक्टूबर तक स्थानीय स्तर पर शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन करने के बाद भी जब शासन-प्रशासन ने मांगों की अनदेखी की तो आदिवासियों ने राजधानी भोपाल कूच कर दिया है।
गुरुवार से शुरू हुई करीब 2 हजार आदिवासी महिला और पुरुषों की यह पैदल पदयात्रा लगातार आगे बढ़ रही है। पदयात्री सीहोर-बिलकिसगंज मार्ग से होते हुए भोपाल की सीमा में प्रवेश करेंगे, जहां वे 17 अक्टूबर को मुख्यमंत्री निवास का घेराव कर अपनी पीड़ा सीधे मुख्यमंत्री के समक्ष रखेंगे।
दो पड़ाव पार कर भोपाल पहुंचेंगे आंदोलनकारी
राजधानी की ओर बढ़ रही आदिवासियों की इस पदयात्रा को व्यवस्थित रखने के लिए आंदोलनकारियों ने रास्ते में दो प्रमुख पड़ाव तय किए हैं। पदयात्रा का पहला रात्रि विश्राम कोनियाझिरी में रखा गया है। यहां विश्राम और भोजन के बाद यात्री सुबह अगले गंतव्य के लिए रवाना होंगे। जबकि यात्रा का दूसरा पड़ाव बैरागढ़ में रहेगा, जिसके बाद सभी आंदोलनकारी एकजुट होकर 17 अक्टूबर को भोपाल में प्रवेश करेंगे और सीधे सीएम हाउस का घेराव करने निकलेंगे। पदयात्रा में शामिल आदिवासी कडक़ड़ाती धूप और लंबे रास्ते की परवाह किए बिना अपने अधिकारों के लिए कदम बढ़ा रहे हैं। उनके चेहरे पर आक्रोश और अपने आशियाने को खोने का दर्द साफ झलक रहा है।
कोसमी में हुई कार्रवाई से भडक़ा जनाक्रोश
आदिवासी नेताओं और ग्रामीणों का आरोप है कि कोसमी क्षेत्र में वन विकास निगम के अधिकारियों ने बर्बरतापूर्वक कार्रवाई की। इस दौरान 12 बेकसूर परिवारों की झोपडिय़ां तोड़ दी गईं, जिससे कई परिवार खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हो गए हैं। खेतों में लहलहाती फसलों पर बुलडोजर चलाकर आदिवासियों की मेहनत को बर्बाद कर दिया गया। पीने के पानी और सिंचाई के एकमात्र साधन कुओं को नुकसान पहुंचाकर उनके सामने जीवनयापन का बड़ा संकट खड़ा कर दिया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन की इस कार्रवाई से उजड़े परिवारों के सामने अब बच्चों और मवेशियों को संभालने और आजीविका चलाने का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
केवल आश्वासन पर वापस लौटने से इनकार
आंदोलनकारियों ने साफ कर दिया है कि वे इस बार केवल मौखिक आश्वासनों पर वापस नहीं लौटेंगे। जब तक उनकी प्रमुख मांगों पर ठोस और लिखित आदेश जारी नहीं होते, वे भोपाल में ही डेरा डाले रहेंगे। आदिवासियों की मांग है कि कोसमी में बिना पुनर्वास व्यवस्था के झोपडिय़ां तोडऩे और फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले वन विकास निगम के अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की जाए और उन पर नियमानुसार कार्रवाई हो। जिन 12 परिवारों के घर उजाड़े गए हैं, उन्हें तुरंत सुरक्षित स्थान पर रहने का प्रबंध और उचित मुआवजा दिया जाए। जमीन पर वर्षों से खेती-किसानी कर रहे सभी पात्र आदिवासी परिवारों को नियमानुसार भूमि के पट्टे प्रदान किए जाएं।
राजधानी तक गूंजेगी आदिवासियों की आवाज
बता दें कोसमी के छोटे से गांव से शुरू हुआ यह जनआंदोलन अब मध्य प्रदेश की राजधानी तक पहुंच रहा है। हजारों आदिवासियों के भोपाल की ओर बढ़ते कदमों ने शासन और प्रशासन की नींद उड़ा दी है। अब देखना यह होगा कि 17 अक्टूबर को होने वाले सीएम हाउस घेराव से पहले प्रशासन आंदोलनकारियों से संवाद स्थापित कर समाधान निकालता है या आदिवासियों का यह डेरा भोपाल में लंबे समय तक जमा रहता है।