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भगवान झूलेलाल का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा, 23 मार्च को निकाला जाएगा भव्य चल समारोह

सीहोर। प्रतिवर्ष अनुसार इस वर्ष भी सिंधी समाज के तत्वाधान में चेटीचंड का पर्व आस्था और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। इस मौके पर आगामी 23 मार्च को भव्य रूप से शाम को समाजजनों को द्वारा चल समारोह निकाला जाएगा।
इस संबंध में जानकारी देते हुए सिंधी समाज के अध्यक्ष रमेश आहुजा ने बताया कि वरण अवतार भगवान श्री झूलेलाल के जन्म उत्सव चेतीचांद पर्व आगामी 23 मार्च को सिंधी कालोनी में धूमधाम से मनाया जाएगा। इस मौके पर 21 मार्च मंगलवार को सुबह अखंड पाठ साहब का शुभारंभ किया जाएगा, वहीं गुरुवार को सुबह दस बजे पाठ साहब की समाप्ति के अलावा शाम पांच बजे भव्य शोभा यात्रा निकाली जाएगी। इसके पश्चात रात्रि नौ बजे से भंडारे का आयोजन किया जाएगा। इस मौके पर समाजजनों ने निर्णय लिया है कि पर्व के दौरान सभी अपने प्रतिष्ठान बंद रखकर आयोजन में प्रमुखता से शामिल होंगे। उन्होंने बताया कि चैत्र शुक्ल द्वितीया से सिंधी नववर्ष का आरंभ होता है। इसे चेटीचंड के नाम से जाना जाता है। चैत्र मास को सिंधी में चेट कहा जाता है और चांद को चण्डु। इसलिए चेटीचंड का अर्थ हुआ चैत्र का चांद। इस बार यह 23 मार्च गुरुवार को है। सभी त्योहारों की तरह इस पर्व के पीछे भी पौराणिक कथाएं हैं। चेटीचंड को अवतारी युगपुरुष भगवान झूलेलाल के जन्म दिवस के रूप में जाना जाता है। उनका जन्म सद्भावना और भाईचारा बढ़ाने के लिए हुआ था। पाकिस्तान के सिंध प्रांत से भारत के अन्य प्रांतों में आकर बस गए हिंदुओं में झूलेलाल को पूजने का प्रचलन ज्यादा है। उपासक भगवान झूलेलाल को उदेरोलाल, घोड़ेवारो, जिन्दपीर, लालसाँई, पल्लेवारो, ज्योतिनवारो, अमरलाल आदि नामों से भी पूजते हैं। भगवान झूलेलालजी को जल और ज्योति का अवतार माना गया है। इसलिए लकड़ी का मंदिर बनाकर उसमें एक लोटे से जल और ज्योति प्रज्वलित की जाती है और इस मंदिर को श्रद्धालु चेटीचंड के दिन अपने सिर पर उठाते हैं, जिसे बहिराणा साहब भी कहा जाता है। सभी त्योहारों की तरह इस पर्व के पीछे भी पौराणिक कथाएं हैं। चेटीचंड को अवतारी युगपुरुष भगवान झूलेलाल के जन्म दिवस के रूप में जाना जाता है।
उनका जन्म सद्भावना और भाईचारा बढ़ाने के लिए हुआ था। पाकिस्तान के सिंध प्रांत से भारत के अन्य प्रांतों में आकर बस गए हिंदुओं में झूलेलाल को पूजने का प्रचलन ज्यादा है। उपासक भगवान झूलेलाल को उदेरोलाल, घोड़ेवारो, जिन्दपीर, लालसाँई, पल्लेवारो, ज्योतिनवारो, अमरलाल आदि नामों से भी पूजते हैं। भगवान झूलेलालजी को जल और ज्योति का अवतार माना गया है।
इसलिए लकड़ी का मंदिर बनाकर उसमें एक लोटे से जल और ज्योति प्रज्वलित की जाती है और इस मंदिर को श्रद्धालु चेटीचंड के दिन अपने सिर पर उठाते हैं, जिसे बहिराणा साहब भी कहा जाता है। संवत् 1007 में पाकिस्तान में सिंध प्रदेश के ठट्टा नगर में मिरखशाह नामक एक मुगल सम्राट राज्य करता था। उसने जुल्म करके हिंदू आदि धर्म के लोगों को इस्लाम स्वीकार करवाया। उसके जुल्मों से तंग आकर एक दिन सभी पुरुष, महिलाएं, बच्चे व बूढ़े सिंधु नदी के पास एकत्रित हुए और उन्होंने वहां भगवान का स्मरण किया। कड़ी तपस्या करने के बाद सभी भक्तजनों को मछली पर सवार एक अद्भुत आकृति दिखाई दी। पल भर के बाद ही वह आकृति भक्तजनों की आंखों से ओझल हो गई। तभी आकाशवाणी हुई कि हिंदू धर्म की रक्षा के लिए मैं आज से ठीक सात दिन बाद श्रीरतनराय के घर में माता देवकी की कोख से जन्म लूंगा। निश्चित समय पर रतनरायजी के घर एक सुंदर बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम उदयचंद रखा गया।
मिरखशाह के कानों में जब उस बालक के जन्म की खबर पहुंची, तो वह अत्यंत विचलित हो गया। उसने इस बालक के मारने की सोची परंतु उसकी चाल सफल नहीं हो पाई। तेजस्वी मुस्कान वाले बालक को देखकर उसके मंत्री दंग रह गए। तभी अचानक वह बालक वीर योद्धा के रूप में नीले घोड़े पर सवार होकर सामने खड़ा हो गया। अगले ही पल वह बालक विशाल मछली पर सवार दिखाई दिया। मंत्री ने घबराकर उनसे माफी मांगी। बालक ने उस समय मंत्री को कहा कि वह अपने हाकिम को समझाए कि हिंदू-मुसलमान को एक ही समझे और अपनी प्रजा पर अत्याचार न करे, लेकिन मिरखशाह नहीं माना। तब भगवान झूलेलाल ने एक वीर सेना का संगठन किया और मिरखशाह को हरा दिया। मिरखशाह झूलेलाल की शरण में आने के कारण बच गया। भगवान झूलेलाल संवत् 1020 भाद्रपद की शुक्ल चतुर्दशी के दिन अन्तर्धान हो गए। संवत् 1007 में पाकिस्तान में सिंध प्रदेश के ठट्टा नगर में मिरखशाह नामक एक मुगल सम्राट राज्य करता था। उसने जुल्म करके हिंदू आदि धर्म के लोगों को इस्लाम स्वीकार करवाया। उसके जुल्मों से तंग आकर एक दिन सभी पुरुष, महिलाएं, बच्चे व बूढ़े सिंधु नदी के पास एकत्रित हुए और उन्होंने वहां भगवान का स्मरण किया। कड़ी तपस्या करने के बाद सभी भक्तजनों को मछली पर सवार एक अद्भुत आकृति दिखाई दी। पल भर के बाद ही वह आकृति भक्तजनों की आंखों से ओझल हो गई। तभी आकाशवाणी हुई कि हिंदू धर्म की रक्षा के लिए मैं आज से ठीक सात दिन बाद श्रीरतनराय के घर में माता देवकी की कोख से जन्म लूंगा। निश्चित समय पर रतनरायजी के घर एक सुंदर बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम उदयचंद रखा गया। मिरखशाह के कानों में जब उस बालक के जन्म की खबर पहुंची, तो वह अत्यंत विचलित हो गया। उसने इस बालक के मारने की सोची परंतु उसकी चाल सफल नहीं हो पाई।  तेजस्वी मुस्कान वाले बालक को देखकर उसके मंत्री दंग रह गए। तभी अचानक वह बालक वीर योद्धा के रूप में नीले घोड़े पर सवार होकर सामने खड़ा हो गया। अगले ही पल वह बालक विशाल मछली पर सवार दिखाई दिया।  मंत्री ने घबराकर उनसे माफी मांगी। बालक ने उस समय मंत्री को कहा कि वह अपने हाकिम को समझाए कि हिंदू-मुसलमान को एक ही समझे और अपनी प्रजा पर अत्याचार न करे, लेकिन मिरखशाह नहीं माना। तब भगवान झूलेलाल ने एक वीर सेना का संगठन किया और मिरखशाह को हरा दिया। मिरखशाह झूलेलाल की शरण में आने के कारण बच गया। भगवान झूलेलाल संवत् 1020 भाद्रपद की शुक्ल चतुर्दशी के दिन अन्तर्धान हो गए।

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