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मकर संक्रांति पर्व व षट्तिला एकादशी का दुर्लभ संयोग: पंडित सुनील शर्मा

सीहोर l इस वर्ष 2026 मे नवग्रह के राजा सूर्य देव धनु राशि से निकल कर अपने पुत्र शनिदेव की मकर राशि में बुधवार माघ कृष्ण पक्ष षट्तिला एकादशी को प्रवेश करेंगे l अतः मकर संक्रांति का पर्व काल 14 जनवरी बुधवार को अनुराधा नक्षत्र में मनाया जाएगा l इस वर्ष 2026 मे मकर संक्रांति के साथ षट्तिला एकादशी का भी विशेष दुर्लभ संयोग 23 वर्ष के बाद बन रहा है जो कि विशेष पुण्यदायी है । मकर संक्रांति के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग व अमृत सिद्धि योग रहेगा l
पंडित सुनील शर्मा के अनुसार भारतीय सनातन संस्कृति में मकर संक्रांति का पर्व भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, भगवान शंकर , भगवान गणेश, आद्यशक्ति माँ दुर्गा, गौ माता और सूर्यदेव की आराधना एवं उपासना का पावन पर्व है l मकर संक्रांति के अवसर पर श्रद्धालुओं को गीता पाठ व आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करना चाहिए l शास्त्र अनुसार इसके प्रभाव से प्राणी की आत्मा शुद्ध होती है। संकल्प शक्ति बढ़ती है। ज्ञान चेतना विकसित होती हैं। मकर संक्रांति इसी चेतना को विकसित करने वाला पर्व है। यह संपूर्ण भारत वर्ष में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है l पितरों की आत्मा की शांति के लिए एवं अपने स्वास्थ्यवर्द्धन तथा सर्वकल्याण के लिए तिल के छः प्रयोग पुण्यदायक एवं फलदायक होते हैं l मनुष्य को तिल जल से स्नान करना, तिल दान करना, तिल से बना भोजन, जल में तिल अर्पण, तिल से आहुति और तिल का उबटन लगाना चाहिए l मकर संक्रांति पर तिल, चावल, खिचड़ी, गुड,अन्न, वस्त्र दान करना चाहिए l इन वस्तुओं का दान करने से मनुष्य को धन, यश, और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है और मां अन्नपूर्णा का आशीर्वाद प्राप्त होता है l

पंडित सुनील शर्मा ने बताया कि मकर सक्रांति के दिन सूर्यदेव दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाते हैं । मकर संक्रांति पर सूर्य देव के उत्तरायण होने से दिन की समय अवधि बड़ने लगती है l शास्त्र अनुसार सूर्य के उत्तरायण होने के बाद से देवों की ब्रह्म मुहूर्त उपासना का पुण्यकाल प्रारंभ हो जाता है। इसे साधना का सिद्धि- काल भी कहा गया है। इस काल में देव प्रतिष्ठा, यज्ञ कर्म, अनुष्ठान इत्यादि पुनीत कर्म किए जाते हैं। मकर संक्रांति का दिन संकल्प का भी दिन है। इस दिन पूजा पाठ,उपवास इत्यादि का संकल्प लिया जाता है और संकल्प पूरे वर्ष तक निभाया जाता है। मकर सक्रांति के पर्व काल मे स्नान, दान,जप, यज्ञ, पूजा पाठ, उपवास, अनुष्ठान,कथा श्रवण और तिल खाने का विशेष महत्व है। शास्त्र अनुसार महाभारत काल में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था। उनका श्राद्ध संस्कार भी सूर्य की उत्तरायण गति में हुआ था। इसलिए आज तक पितरों की प्रसन्नता के लिए तिल अर्घ्य एवं जल तर्पण की प्रथा मकर संक्रांति के अवसर पर प्रचलित है l

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