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कांग्रेस की चूक या गलती ?

सुमित शर्मा
मध्यप्रदेश से राज्यसभा की एकमात्र सीट को भी गंवाने वाली कांग्रेस पार्टी पर इस समय कई तरह के आरोप लग रहे हैं तो वहीं पार्टी नेतृत्व पर भी उंगलियां उठ रही हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि पार्टी में इतने ’दिग्गज नेताओं’ की उपस्थिति के बाद भी यह स्थिति बन गई, जिसकी किसी को उम्मीदें नहीं थीं। अब राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी जोरों से है कि यह कांग्रेस पार्टी की ’चूक’ है या फिर से एक बार ’गलती’ को दोहराया गया है। दरअसल कांग्रेस पार्टी गलती पर गलती और उन गलतियों पर भी लगातार गलतियां कर रही हैं। यही कारण है कि कांग्रेस को जहां देश के कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों (केरल को छोड़कर वहां यूडीएफ के साथ गठबंधन में कांग्रेस ने चुनाव जीता।) में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ रहा है तो वहीं अब मध्यप्रदेश के कोटे से एकमात्र राज्यसभा सीट को भी गंवाने की स्थिति बन गई है। फिलहाल तो यही स्थिति है, क्योंकि कांग्रेस पार्टी मामले को लेकर चुनाव आयोग और कोर्ट में गई है। अब सबकी नजर इनके फैसले पर टिकी हुई है, लेकिन वर्तमान स्थितियों में कांग्रेस के हाथों से यह सीट फिसलती हुई नजर आ रही है। कांग्रेस पार्टी से ऐसी गलती पहली बार नहीं हुई है। ऐसे समय में वर्ष 2009 का वह लोकसभा चुनाव भी याद आता है। उस समय विदिशा संसदीय सीट से भाजपा ने सुषमा स्वराज और कांग्रेस ने राजकुमार पटेल को चुनाव मैदान में उतारा था। उस समय कांग्रेस उम्मीदवार राजकुमार पटेल का नामांकन खारिज हुआ था। राजकुमार पटेल ने नामांकन के साथ आवश्यक बी-फॉर्म जमा नहीं किया था। जिस कारण से उनका नामांकन फॉर्म निरस्त हो गया था और सुषमा स्वराज को वॉकओवर मिल गया था। उनके खिलाफ विपक्ष को कोई मजबूत उम्मीदवार नहीं मिला था। इस घटना के बाद कांग्रेस उम्मीदवार राजकुमार पटेल पर पैसे लेने के आरोप भी लगे थे। हालांकि बाद में कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से ही निष्कासित कर दिया था। अब एक बार फिर कांग्रेस की इस लापरवाही से यह सवाल भी उठने लगे हैं कि यह कांग्रेस की ’चूक’ है या फिर से उस ’गलती’ को ही दोहराया गया है। पार्टी के अंदरखानों से यह खबरें भी आ रही हैं कि पार्टी में ही कोई ’विभीषण’ निकला है, जिसने यह स्थिति निर्मित की है। खैर राजनीति है आरोप-प्रत्यारोप का दौर तो लगातार चलता रहता है, लेकिन वास्तविक स्थिति पर लौटे तो क्या कांग्रेस पार्टी के पास अब ऐसे नेतृत्व का संकट है, जो इन स्थितियों को भांप सके या ऐसी स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहें। इस पूरे घटनाक्रम में जहां कमलनाथ सिर्फ सोशल मीडिया तक ही सीमित दिखे तो वहीं दिग्विजय सिंह की भूमिका भी उस तरह से नजर नहीं आई जो वे कर सकते थे। वे पार्टी के साथ नजर आए, लेकिन उस भूमिका में नहीं दिखे। अजय सिंह राहुल भैया की भी भूमिका उतनी सक्रिय नजर नहीं आई। चूंकि मामला बेहद संवेदनशील था, राज्यसभा चुनाव का मामला था, कांग्रेस को उम्मीद थी कि वह इस सीट से जीतेगी, लेकिन स्थितियां एकदम विपरीत हो गईं। अब इस सीट से भाजपा के प्रत्याशी महेश केवट का राज्यसभा जाना लगभग तय है। भाजपा ने जातिगत समीकरणों को साधने के लिए उनका नाम राज्यसभा के तीसरे उम्मीदवार के तौर पर घोषित किया था। यदि चुनाव जीत गए तो ठीक है, वरना प्रत्याशी उतारकर भी जातिगत समीकरण साधे जा सकेंगे। अब कांग्रेस पार्टी अपनी इस गलती को छिपाने के लिए भाजपा पर सीट चोरी का आरोप लगा रही है तो वहीं भाजपा के प्रदेश महामंत्री राहुल कोठारी को लेकर कह रही है कि उन्होंने इसकी शिकायत की है, जबकि वे न तो उम्मीदवार हैं और न ही वोटर हैं। भाजपा उस दिन से ही तैयारियों में जुट गई थी, जब कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन को अपना उम्मीदवार घोषित किया था। वैसे भी भारतीय जनता पार्टी की यह विशेषता है कि वह कोई भी चुनाव हो, पूरी तैयारियों के साथ ही मैदान में उतरती है। भाजपा की ये तैयारियां भी इस बार पुख्ता थीं और उन्होंने पूरी तैयारी के साथ ही अपना तीसरा उम्मीदवार भी मैदान में उतारा था। कांग्रेस के पास ’अब पक्षताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत’ वाली स्थिति है।

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