
सीहोर। जिले भर में धार्मिक उल्लास का माहौल बना हुआ है। एक तरफ जहां कल रविवार से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होने जा रही है, वहीं दूसरी तरफ आज शनिवार को भूतड़ी अमावस्या के पावन अवसर पर पवित्र नदियों पर श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। सुबह से ही भारी संख्या में लोग स्नान और पूजा-अर्चना के लिए पहुंच रहे हैं। जिले में नर्मदा तट पर स्थित प्रसिद्ध आंवलीघाट और इछावर तहसील के ग्राम नादान के पास कालियादेव में आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला है।
हिन्दू पूजा-पद्धति और मान्यताओं के अनुसार अमावस्या से लेकर एकादशी तक के कालखंड में अनेक प्रकार के व्रत और पूजन का विधान है। लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार पवित्र नदियों में स्नान कर पुण्य लाभ कमाते हैं। भूतड़ी अमावस्या एक ऐसी विशेष तिथि है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु स्नान-पूजन करते हैं।
हालांकि इसके नाम को लेकर कई बार लोगों में भ्रम हो जाता है कि इसका संबंध भूतों-प्रेतों से है, लेकिन इसका भूतों से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। इसका वास्तविक और आध्यात्मिक अर्थ मन और मस्तिष्क में पल रहे नकारात्मक विचारों से मुक्ति पाना है। जीवन में किसी भी रूप में उत्पन्न होने वाली मानसिक नकारात्मकता को त्यागने के लिए ही इस तिथि पर पवित्र नदियों में स्नान करने की परंपरा है।
आंवलीघाट का पौराणिक-आध्यात्मिक महत्व
नर्मदा तट पर स्थित आंवलीघाट का आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद खास स्थान है, जहां दूर-दूर से श्रद्धालु मां नर्मदा में डुबकी लगाने पहुंचते हैं। इस घाट से जुड़ी कई पौराणिक मान्यताएं और विशेषताएं हैं। इस घाट की विशेषता यह है कि यहां हत्याहरणी हथेड़ नदी और मां नर्मदा का संगम होता है, जिससे इसका धार्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
पांडवों ने बिताया था समय
कहा जाता है कि पांडवों ने अपने वनवास काल का कुछ समय इसी क्षेत्र में बिताया था। एक अन्य किंवदंती के अनुसार महाभारत काल में भीम ने मां नर्मदा का जल प्रवाह रोकने के लिए जो विशाल चट्टानें नदी में डाली थीं, वे आज भी वहीं मौजूद हैं।
माता लक्ष्मी के रथ के निशान
एक और प्रसिद्ध लोक मान्यता है कि माता लक्ष्मी रथ पर सवार होकर माता कुंती से मिलने यहीं आई थीं और उस रथ के पहियों के निशान आज भी यहां के पत्थरों पर स्पष्ट दिखाई देते हैं। आंवलीघाट पर लक्ष्मी कुंड, ब्रह्म पाश, भावनाथ बाबा की टेकरीए छोटे दादा धूनीवाले का स्थान, नर्मदा मंदिर, हनुमान मंदिर, राम-जानकी मंदिर तथा दोनों किनारों पर बने प्राचीन नर्मदा व राम-जानकी मंदिरों सहित कई अन्य पवित्र स्थल स्थित हैं।
कालियादेव मेला: जनजातीय संस्कृति और परंपरा की अनुपम छटा
इसी तरह इछावर तहसील के ग्राम नादान के पास सागौन के घने जंगलों के बीच स्थित कालियादेव एक बेहद खूबसूरत और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण धार्मिक स्थल है। यहां से निकली सीप नदी पर कालियादेव का झरना स्थित है। झरने के पास ही एक छोटा मंदिर है और मंदिर के ठीक नीचे एक गहरा कुंड है, जिसमें सीप नदी का पानी गिरता है। इस गहरे कुंड को यहां के जनजातीय बंधु गहरी आस्था के साथ पाताल लोक का रास्ता भी कहते हैं।
बड़ी संख्या में जुटते हैं लोग
भूतड़ी अमावस्या के मौके पर इस क्षेत्र के जनजातीय समुदाय के महिलाए पुरुष और बच्चे बड़ी संख्या में शाम को यहां पहुंचने लगते हैं। सीप नदी में कालियादेव की विधि विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। यहां रात्रि में एक विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं।
संस्कृति और आधुनिकता का संतुलन
यह मेला जनजातीय संस्कृति और परंपरा की अनुपम छटा बिखेरता है। आज भी जनजातीय वर्ग अपनी अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को सहेजे हुए है। वे अपनी आदिम संस्कृति को छोड़े बिना वर्तमान जीवन के साथ सुंदर संतुलन स्थापित कर जीवन के वास्तविक आनंद पलों को महसूस करते हैं।