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‘सारू-मारू’ बौद्ध स्तूप परिसर में अवैध खुदाई, लोगों में आक्रोश

सीहोर। बुधनी तहसील के ग्राम पानगुराडिय़ा में स्थित देश की अमूल्य ऐतिहासिक और राष्ट्रीय धरोहर सारू-मारू बौद्ध स्तूप और गुफाओं को नुकसान पहुुंचाने का मामला सामने आया है। सोशल मीडिया पर इस घटना की तस्वीरें वायरल होने के बाद से इतिहास प्रेमियों और स्थानीय जनता में गहरा गुस्सा है।
बताया जा रहा है कि कुछ अज्ञात असामाजिक तत्वों ने इस संवेदनशील पुरातात्विक स्थल पर घुसकर अवैध खुदाई की है। इन तत्वों ने न केवल परिसर को नुकसान पहुंचाया, बल्कि वहां मौजूद प्राचीन पेड़ों की जड़ों तक को खोद डाला। इस कृत्य से इस ऐतिहासिक स्थल की मूल संरचना को भारी क्षति पहुंची है।
घटना की जानकारी मिलते ही सारू-मारू बौद्ध स्तूप समिति के सदस्यों ने मौके का निरीक्षण किया और इस कृत्य की कड़ी निंदा की। समिति ने याद दिलाया कि यह प्राचीन स्मारक अधिनियम के तहत एक गंभीर और दंडनीय अपराध है।
प्रशासन से 3 प्रमुख मांगें
उच्च स्तरीय जांच: प्रशासन तुरंत इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच करवाए।
कड़ी कानूनी कार्रवाई: अज्ञात दोषियों को जल्द से जल्द चिन्हित कर उनके खिलाफ सख्त एफआईआर दर्ज की जाए और उन्हें जेल भेजा जाए।
पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और जिला प्रशासन मिलकर इस राष्ट्रीय धरोहर की सुरक्षा के लिए यहां पुख्ता इंतजाम (जैसे सुरक्षा गार्ड और बाउंड्री) करे।
सारू-मारू गुफाओं और स्तूप का इतिहास
बुधनी के पानगुराडिय़ा में स्थित सारू-मारू का इतिहास बेहद गौरवशाली और प्राचीन है। इसका सीधा संबंध मौर्य वंश के महान सम्राट अशोक (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) से है।
इतिहासकार बताते हैं कि जब सम्राट अशोक मौर्य साम्राज्य के राजकुमार थे] तब वे उज्जैन जाते समय अक्सर इस मार्ग से गुजरते थे। लोककथाओं के अनुसार सारू-मारू का नाम सम्राट अशोक की पत्नी महारानी देवी (जिन्हें विदिशा की शाक्यकुमारी भी कहा जाता है) और उनकी पुत्री संघमित्रा व पुत्र महेन्द्र के बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार से भी जोड़ा जाता है।
बौद्ध भिक्षुओं का प्रमुख केंद्र
यह स्थल प्राचीन काल में बौद्ध भिक्षुओं के रहने और ध्यान लगाने का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था। यहां पहाडय़िों पर कई प्राकृतिक और मानव निर्मित गुफाएं हैं, जिनमें भिक्षु निवास करते थे।
अशोक के शिलालेख
इस स्थल की सबसे बड़ी खासियत यहां मिले सम्राट अशोक के शिलालेख और स्तूप हैं। इन शिलालेखों में सम्राट अशोक के यहां आगमन और उनके धार्मिक संदेशों का जिक्र मिलता है। भौगोलिक दृष्टि से यह स्थल सांची के प्रसिद्ध बौद्ध स्तूपों के नेटवर्क का ही एक हिस्सा माना जाता है, जो विंध्याचल की पहाडिय़ों में फैला हुआ है।

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