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मिशन वात्सल्य: प्रदेश में 30 हजार बच्चों को सुरक्षा कवच का दावा, सीहोर में बजट संकट से 575 मासूम तीन माह से बेसहारा

सीहोर। प्रदेश सरकार महिला एवं बाल विकास और बाल संरक्षण के क्षेत्र में संवेदनशीलता के नए प्रतिमान स्थापित करने के बड़े-बड़े दावे कर रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मिशन वात्सल्य के तहत संचालित चाइल्ड हेल्पलाइन-1098 संकटग्रस्त बच्चों के लिए अभेद्य सुरक्षा कवच बनी हुई है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में इस हेल्पलाइन के जरिए रिकॉर्ड 30 हजार 810 संकटग्रस्त बच्चों को सहायता पहुंचाने और चालू वित्तीय वर्ष में 15 मई तक 4 हजार 376 बच्चों तक त्वरित मदद का दावा किया जा रहा है। भोपाल, इंदौर, जबलपुर जैसे बड़े शहरों में इस नेटवर्क के जरिए बच्चों को रेस्क्यू करने की पीठ थपथपाई जा रही है, लेकिन इसी योजना के दूसरे पहलू की जमीनी हकीकत सीहोर जिले में बेहद कड़वी और चिंताजनक है।
यहां अनाथ, निराश्रित और बेसहारा बच्चों के सिर पर सुरक्षित आशियाना और शिक्षा का हाथ रखने के लिए शुरू की गई महत्वाकांक्षी मिशन वात्सल्य की स्पॉन्सरशिप योजना खुद गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रही है। बजट के अभाव में बीते तीन महीनों से इन मासूम बच्चों के खातों में प्रति माह मिलने वाली 4 हजार रुपए की सहायता राशि नहीं पहुंच पाई है। नतीजा यह है कि अपनों को खो चुके इन बच्चों की परवरिश अब दाने-दाने को मोहताज होने लगी है।
जिले के 575 मासूम अब भी मदद से महरूम
आंकड़ों की बात करें तो सीहोर जिले में इस स्पॉन्सरशिप योजना के तहत कुल 1840 लाभार्थी बच्चे पंजीकृत हैं। इनमें से 124 बच्चे ऐसे हैं, जिनके माता और पिता दोनों की मृत्यु हो चुकी है, जबकि 70 बच्चे दिव्यांग श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा 375 बच्चे अपने दूर के रिश्तेदारों या संरक्षकों के पास रह रहे हैं और कई बच्चे अपनी एकल मां (सिंगल पेरेंट) के सहारे पल रहे हैं। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक आखिरी बार 11 मई 2026 को जिले के 1,265 बच्चों को तो जैसे-तैसे सहायता राशि मिल गई थी, लेकिन बजट की कमी के चलते 575 मासूम बच्चे इस आर्थिक सहायता से पूरी तरह महरूम रह गए।
कमरतोड़ महंगाई में उधारी का सहारा
इस राशि का मकसद बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी, पढ़ाई और बेहतर माहौल की व्यवस्था करना है। लेकिन पिछले तीन महीनों से यह मदद थमी हुई है। एक पीडि़त बच्चे के बुजुर्ग संरक्षक ने नम आंखों से अपना दर्द बयां करते हुए कहा एक तो माता-पिता का साया पहले ही उठ गया, ऊपर से कमरतोड़ महंगाई ने जीना दुश्वार कर दिया है। राशन से लेकर पढ़ाई की चीजें तक महंगी हो गई हैं। अगर सरकार की यह मदद समय पर मिल जाती तो बच्चों का पेट पालना आसान हो जाता। अब उधारी के सहारे दिन काटने पड़ रहे हैं।
बजट आते ही खातों में भेजी जाएगी राशि
इस संवेदनशील और गंभीर मामले को लेकर महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला अधिकारी ज्ञानेश खरे का कहना है कि इस बार केंद्र सरकार से योजना का आवश्यक बजट प्राप्त नहीं हो पाया है। जैसे-जैसे विभाग के पास बजट उपलब्ध होता है, बच्चों के खातों में राशि ट्रांसफर कर दी जाती है। कई बार बजट आने पर बच्चों के खातों में पिछले महीनों की इक_ा राशि भी एक साथ डाल दी जाती है। विभाग लगातार प्रयास कर रहा है कि जल्द से जल्द बजट मिले ताकि बच्चों की पढ़ाई और परवरिश प्रभावित न हो।

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