धर्म

10 जुलाई रविवार हरिशयनी एकादशी, चातुर्मास की शुरुआत

 इंदौर
 सहस्त्र गोदान का फल देने वाली हरिशयनी एकादशी के साथ रविवार से आत्म संयम के पर्व चातुर्मास की शुरुआत होगी। इसके साथ ही तप, साधना और उपवास में दिन बीतेंगे और तीज-त्योहार का उल्लास छाएगा। संतों के सान्निध्य में आत्म कल्याण के लिए साधक साधना में जुट जाएंगे। विद्वानों के मुताबिक इस समय को मांगलिक कार्यों से इतर धर्म-ध्यान और संतों की सेवा के लिए उपयुक्त माना गया है।

ज्योतिर्विद कान्हा जोशी के अनुसार आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी की शुरुआत शनिवार को शाम 4.39 बजे होगी जो अगले दिन रविवार को दोपहर 2.13 बजे तक रहेगी। उदया तिथि रविवार को होने से 10 जुलाई को देवशयनी एकादशी व्रत किया जाएगा। एकादशी का पारणा 11 जुलाई को सुबह 5.56 से 8.36 बजे तक होगा। देवशयनी एकादशी 10 जुलाई से 4 नवंबर देवप्रबोधिनी एकादशी तक विवाह आदि मांगलिक कार्य नहीं होंगे। ज्योतिर्विद नीलकंठ गुरुजी ने बताया कि चातुर्मास में सावन, भादौ, आश्विन व कार्तिक मास आते हैं। यह समय मांगलिक कार्यों से इतर धर्म-ध्यान और संतों की सेवा के लिए उपयुक्त माना गया है। इस दौरान बैंगन, पत्तेदार सब्जियां, तला और मसालेदार भोजन का सेवन नहीं किया जाता है।

समग्र मराठी समाज निकालेगा दिंडी यात्रा – समग्र मराठी समाज द्वारा 10 जुलाई को आषाढ़ी एकादशी पर दिंडी यात्रा निकाली जाएगी। यात्रा शाम 6 बजे कृष्णपुरा छत्री, वीर सावरकर मार्केट, महालक्ष्मी मंदिर, आड़ा बाजार, यशवंत रोड से पंढरीनाथ मंदिर जाएगी। इसमें बड़ी संख्या में मराठी भाषी शामिल होंगे। समाजजन पारंपरिक वेशभूषा में कीर्तन करते हुए चलेंगे।

एक स्वरूप करेगा क्षीर सागर में शयन तो दूसरा राजा बलि के यहां बनेगा द्वारपाल

    आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक के समय को साधना का विशेष काल माना जाता है। विष्णु पुराण के अनुसार इस दौरान सर्वव्यापक भगवान विष्णु का एक स्वरूप क्षीर सागर में शयन और दूसरा राजा बलि के यहां द्वारपाल बनकर रहेगा।

    भविष्य पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद् भागवत पुराण के अनुसार श्रीहरि के शयन को योग निद्रा कहा जाता है। इस दौरान मांगलिक कार्य इसलिए नहीं किए जाते हैं क्योंकि प्रत्यक्ष देव सूर्य और चंद्र का तेज पृथ्वी पर कम पहुंचता है।

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